बुंदेलखंड के लिए मुफीद है आम्रपाली आम

Jalaun Updated Tue, 24 Jul 2012 12:00 PM IST
कोंच (जालौन)। बात जब आम की हो तो बरबस आमों के राजा दशहरी का नाम जुबां पर आता है, लेकिन दशहरी और नीलम के युग्म से जब संकर प्रजाति .आम्रपाली. का स्वाद चखा गया तो अन्य आम फीके लगे। आम्रपाली आमों की रानी से किसी भी तरह कम नहीं है। कोंच तहसील क्षेत्र के गांव चांदनी के किसान श्यामसुंदर ने सवा एकड़ में आम्रपाली के पेड़ लगा रखे हैं। वह प्रतिवर्ष करीब सवा लाख का मुनाफा कमा कर अपनी तकदीर चमका रहे हैं।
चांदनी गांव कोंच तहसील मुख्यालय से करीब छह किमी दूर दक्षिण में बसा है, यहां के लघु किसान श्यामसुंदर कभी यहां के प्रधान भी रहे हैं। उन्होंने कुछ नया करने का बीड़ा उठाया तो किस्मत ने भी इनका खूब साथ दिया। विश्व बैंक द्वारा पोषित कृषि विविधीकरण योजना के अंतर्गत बर्ष 2003 में प्रदर्शन के लिए उन्हें आम्रपाली के तीन सौ पौधे दिए गए थे जिन्हें इन्होंने अपने सवा एकड़ के खेत में लगा दिया और बच्चों की तरह इनकी परवरिश की। सिर्फ तीन साल में ही इन वृक्षों ने फल देना प्रारंभ कर दिया। श्यामसुंदर को आज आम्रपाली से प्रति वर्ष करीब सवा लाख की आमदनी हो जाती है। श्यामसुंदर बताते हैं आम की इस प्रजाति की खास बात यह है कि इसमें प्रति वर्ष फल आते हैं जबकि अन्य प्रजातियों में अमूमन एक वर्ष छोड़ कर दूसरे वर्ष फल लगते हैं। जलवायु की दृष्टि से बुंदेलखंड की मिट्टी आम की आम्रपाली प्रजाति के लिये पूरी तरह मुफीद है। हालांकि इसे बोनसाई तो नहीं कहा जा सकता लेकिन आम्रपाली का पेड़ बमुश्किल चार मीटर ऊंचा ही होता है जो आम के आम पेड़ों की तुलना में बोनसाई जैसा ही है। जमीन पर खड़े होकर इसके फलों को तोड़ा जा सकता है। पौधे से पौधे की दूरी चार मीटर रखी जाती है और इसका रखरखाव भी बिल्कुल सामान्य है। जनपद जालौन में चांदनी के अलावा औंता में भी प्रदर्शन के लिये इस प्रजाति के पौधे दिये गये थे जहां रखरखाव के अभाव में सिर्फ कुछ ही पेड़ बचे हैं। उन्होंने बताया सरकार ने बागवानी को प्रोत्साहित करने के लिए आम्रपाली प्रजाति को बतौर प्रदर्शन यहां उतारा था, देखा जाये तो प्रदर्शन में यह खरी उतरी है। किसान अगर इसे अपनाते हैं तो वे इससे अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं। दरअसल, बागवानी के दृष्टिकोण से जनपद जालौन के किसानों में जागरूकता का पूरी तरह अभाव है, यहां के किसान पूरी तरह से सिर्फ सीधी-सीधी खेती में विश्वास करते हैं और अपनी दो इंच भी जमीन बागवानी में नहीं फंसाना चाहते हैं। यहां बागों की कमी का सबसे बड़ा कारण यही है कि खेती में साल भर की रोटी का जुगाड़ हो जाने से ही यहां का किसान संतुष्ट हो जाता है जबकि आज क्रांति का युग है, थोड़ा सा रिस्क तो लेना ही पड़ेगा अगर बड़ी मुनाफा कमाना है। हालांकि मैंथा की खेती अपना कर किसान की दशा कुछ सुधरी है लेकिन यह खेती दीर्घकालिक नहीं है क्योंकि इसके ही कारण यहां का भूगर्भ जल तेजी से नीचे सरक रहा है। प्रगतिशील किसान श्यामसुंदर ने कहा कृषि विभाग यहां के किसानों को कृषि विविधीकरण योजना के तहत नई-नई जानकारियां उपलब्ध कराए और इनको प्रयोग में लाने के लिये किसानों को प्रेरित करे ताकि अन्य किसान भी कम लागत और कम क्षेत्रफल में अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकें।

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