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कहीं गुम न हो जाए लकड़ी की कारीगरी

Jalaun Updated Tue, 17 Jul 2012 12:00 PM IST
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उरई (जालौन)। एक जमाना था कि जब गांव के बढ़ई के वसूला व आरी की कारीगरी की नक्काशी खिड़की दरवाजे से लेकर हर जगह देखी जा सकती थी। हाथों के इस हुनर को आधुनिक फर्नीचर ने थाम दिया है। हालत यह है कि अब बढ़ई परिवारों को पुश्तैनी धंधा छोड़कर मजदूरी करने के लिए दूसरे प्रांतों को रुख करना पड़ रहा है।
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आधुनिकता सज्जा स्टील के फर्नीचरों का चलन, आधुनिक कृषि यंत्रों ने ग्रामीण क्षेत्र के कारपेंटरों की रोजी रोटी छीन ली है। वह अब मुफलिसी की कगार पर पहुंच गए हैं। पीढ़ियों से चल रहा उनका धंधा बंद हो गया है। उनके बच्चे अब मजदूरी करने के लिए दूसरे प्रदेश चले गए हैं। पहले जिनको काम से फुर्सत नहीं मिलती थी अब उन्हेें बेकार बैठकर समय काटना पड़ रहा है। पहले उनके औजारों की धार चमकती रहती थी अब उन पर जंग लग रही है। ऐसे ही एक परिवार से जब संवाददाता ने बात की तो उसने जो अपनी आपबीती सुनाई तो उनका दर्द सामने आ गया।

मुहम्मदाबाद निवासी श्रीनारायण बढ़ई (65) ने बताया कि पिछली कई पीढ़ियों से उनके यहां बढ़ईगीरी का काम होता आ रहा है। उसके बाबा मंती उसके बाद पिता धन्नी बढ़ई गीरी का कार्य करते थे। बड़े होने के साथ उसने भी पिता के काम में हाथ बंटना शुरू हो कर दिया। उस समय गांव तथा आसपास के क्षेत्रों के लोग उसके यहां लकड़ी के हल, लकड़ी के बखर, लकड़ी की नारी, शादी विवाह के मंडप आदि बनवाते थे। इसके अलावा दरवाजों की चौखटें भी लोग उससे बनवाते थे। अब जब से खेतों में ट्रैक्टर चलने लगे। लोग घरों में आधुनिक स्टील की चौखटें लगाने लगे। यहां तक कि अब शादी विवाह भी शहरों में जाकर विवाह घरों से करने लगे तब से उसकी रोजी रोटी बिल्कुल बंद हो गई। अब कभी कभार कोई ग्रामीण उससे जानवर बांधने के लिए खूंटा बनवाते थे। इन हालातों में उसके बेटे दशरथ तथा पंकज अहमदाबाद में कपड़ों की फैक्ट्री में मजदूरी कर रहे हैं। यहां वह तथा उसकी पत्नी श्रीमती रामवती रह रहे हैं।

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