डाकसेवकों के थैलों में चल रहे डाकघर

Jalaun Updated Thu, 21 Jun 2012 12:00 PM IST
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मुहम्मदाबाद (जालौन)। ग्रामीण क्षेत्र में डाकघरों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। कई गांवों में तो डाकघरों का कोई पता ही नहीं है। अगर कहीं डाकघर हैं तो कोई सुविधा नहीं है। डाकिए आज भी साइकिल से बीस बीस किलोमीटर दूर तक डाक बांटने जाते हैं। गांव में डाकघर न होने से डाकिया अपने थैले में पूरा डाक घर लेकर चलते हैं।
डकोर विकासखंड में उपडाकघर की स्थापना 1982 में हुई थी लेकिन आज तक न तो डाकखाने की अपनी बिल्डिंग है और न ही बिजली कनेक्शन, पानी की सुविधा भी नहीं है। ग्राहकों व कर्मचारियों को बैठने के लिए कुर्सी नहीं है। इतना ही नहीं बिजली कनेक्शन न होने से थैलेे में बंद डाकघर का कंप्यूटर दो साल से धूल फांक रहा है। डकोर के डाकघर से कई डाकघरों की शाखाएं जुड़ी हैं जिनमें गुढ़ा, जैसारी, कुसमिलिया, मुहम्मदाबाद, मुहाना, बंधौली, डकोर आदि गांव जुडे़ हैं। इन गांवों में डाकघरों का कोई पता ही नहीं चलता है। न तो डाकघरों का कोई बोर्ड लगा है और न ही पत्र पेटिका का कोई अता पता है। अगर किसी को डाक से पत्र वगैरह भेजना है तो पता ही नहीं चलता कि कहां पर डाक डालेें, टिकट लेना या मनीआर्डर करना हो तो कहां जाएं। डाकखाने का डाकसेवक एक थैले में पूरा डाकखाना चला रहा है, अगर वह डाकसेवक मिल गया तो ठीक है नहीं तो लोगों को शहर मुख्यालय आकर डाक भेजनी पड़ती है।
मुहम्मदाबाद, डकोर, कुसमिलिया, जैसारी, बंधौली आदि गांवों के दर्जनों लोगों में सोनू यादव, तौसीफ खान, बृजेश राजपूत, वीरपाल राजपूत, विनोद यादव, चतुर सिंह, सुनील पाठक, संजय त्रिपाठी आदि ने बताया कि डकोर उपडाकघर है। उसमें डाकघर स्थापित है जिसमें न पानी की व्यवस्था है और न ही बिजली कनेक्शन है जिससे ग्राहकों व कर्मचारियों को भारी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। गर्मी में तो और भी बुरा हाल हो जाता है। डाकियों को बीहड़ इलाकों में रोजाना बीस किलोमीटर दूर गर्मी में जाना पड़ता है। कुछ डाकसेवकों का कहना है कि इस महंगाई में गांव का कमरा किराये पर लेने के लिए सरकार से सौ रुपए मिलते हैं। सौ रुपए में कमरा किराये पर नहीं मिलता है। बड़ी मुश्किल से तो गांव में पत्र पेटिका टांगने की जगह मिलती है उसकी भी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती।
इस बाबत कार्यवाहक सब पोस्ट मास्टर अश्विनी कुमार का कहना है कि डकोर उपडाक घर में 2500 चालू खाते हैं। बीपीएल, मनरेगा के 2000 खाते हैं। वहीं आरडी 5 हजार खाता धारक हैं। अगर पूरी सुख सुविधा के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में डाकघर स्थापित हों तो डाकघरों में ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होती रहेगी लेकिन हालत यह है कि ड्रेस, छाता व झोला तक नहीं मिलते हैं।

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