सोंधी मिट्टी की याद गांव खींच लाती है

Jalaun Updated Mon, 11 Jun 2012 12:00 PM IST
मुहम्मदाबाद/उरई (जालौन)। मनरेगा की मजदूरी से साहब परिवार का गुजारा नहीं होता है। इसलिए ही परदेश कमाने जाना पड़ता है, लेकिन वहां अपने गांव की सोंधी मिट्टी की याद हमेशा सताती रहती है। यह कहना है मजबूरी में परदेश कमाने जाने वाले ईंट-भट्ठा मजदूरों का। ऐसे मजदूर बरसात के समय गांव आकर
अपने लोगों के बीच बेहद खुश नजर आते हैं।
डकोर क्षेत्र के अति पिछड़े गांव ऐरी, रमपुरा, गुढ़ा और समिरिया आदि गांवों में अमर उजाला संवाददाता गया तो गांव में काफी रौनक थी। नन्हे मुन्ने से लेकर बुजुर्ग तक नए कपड़े पहने थे। जब ग्रामीणों से गांव के खुशनुमा माहौल के बारे में पूछा गया तो एक ग्रामीण तपाक से बोला, लरका आठ महीना बाद आओ है बोई नए कपड़ा लाओ है। ऐरी निवासी उर्मिला और राजू आदि ने बताया वह मध्यप्रदेश में ईट भट्ठे पर काम करके लौटे हैं। पिछले आठ महीने के दौरान उनकी कमाई ठीक ठाक हो गई है। कमाई से उनकी साल भर गृहस्थी अच्छे ढंग से चलेगी। खरगा निवासी जीवन लाल ने बताया मनरेगा की मजदूरी में गुजारा नहीं होता। उस पर प्रधान अपने चहेतों को ही काम देते हैं। लिहाजा गांव के मजदूर परदेश में मजदूरी करने मजबूरी में जाते हैं। यह एक दो मजदूर नहीं बल्कि डकोर क्षेत्र के हर गांव के मजदूरों का हाल है। आठ महीने तक गांव में सन्नाटा रहता है। अब गांव एक बार फिर गुलजार नजर आ रहे हैं। मुहम्मदाबाद के ग्राम प्रधान बालस्वरुप राजपूत का कहना है प्रधान मनरेगा का काम देने में भेदभाव नहीं करे तो ग्रामीणों का पलायन रुक सकता है।

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