हत्यारोपियों के खौफ से हो रहा पलायन

Jalaun Updated Sun, 03 Jun 2012 12:00 PM IST
रामपुरा/उरई (जालौन)। वर्ष 2005 में पांच लाख के ईनामी दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद रामपुरा बीहड़ क्षेत्र के गांवों में लोगों ने घी के दिए जलाकर खुशियां मनाई थी। वह खुश थे कि पिछले तीन दशक से डकैतों के खौफ से निजात मिलेगी। यही नहीं बीहड़ के गांव बिलौड़, सुल्तानपुरा, हुकुमपुरा, जखेता अंगेदला की मड़ैया से लेकर इटावा व भिंड क्षेत्र के लोगों राहत की सांस ली थी। यही नहीं पलायन कर चुके लोग अपने घरौंदों में लौटकर खेती बाड़ी का काम करने लगे थे। इस बीच बीहड़ क्षेत्र के ग्राम सुल्तानपुरा में वर्चस्व की जंग को लेकर दबंग मुनेश यादव ने गांव के ही सुखवीर गुर्जर की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी। और फरार हो गया। मृतक व हत्यारोपी दोनों के दस्यु सरगना पहलवान गुर्जर से संबंध रहे और वह अपहरण मुठभेड़ आदि के मामलों में जेल भी गए। अब लोगों को भय सता रहा है कि कहीं मुनेश याद बीहड़ का रास्ता अख्तियार न कर ले लिहाजा 50 से 60 घरों वाले इस यादव, गुर्जर व दलित बिरादरी के परिवार गांव से पलायन कर गए हैं। पूरा गांव खाली व वीरान पड़ा है। गांव में तैनात सिद्धपुरा चौकी के सिपाही भी वापस चौकी पहुंच गए हैं। मृतक के पुत्र दीपराज गुर्जर ने तीन दिन पूर्व एसपी नवनीत कुमार राणा को प्रार्थनापत्र देकर हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की मांग की थी, लेकिन अब तक पुलिस गांव में नहीं गई है। इस बाबत प्रभारी थानाध्यक्ष चंद्रिका प्रसाद ने बताया कि दो हत्यारोपी महेश व ज्ञान सिंह अदालत में हाजिर हो चुके हैं। जबकि मुख्य अभियुक्त मुनेश यादव व जितेंद्र की तलाश की जा रही है। गांव से पलायन की बाबत उन्होंने बताया कि दो लोग डर के मारे घर छोड़कर चले गए हैं।

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कभी डकैतों से खाली नहीं रहा बीहड़
उरई (जालौन)। पचनदा व चंबल का बीहड़ कभी डकैतों से खाली नहीं रहे हैं। सिंधु, क्वारी, यमुना, पहुंज, चंबल पांच नदियों का संगम होने के बावजूद यहां के भौगोलिक स्थित दुर्गम है। लोगों को आन जाने के लिए परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए भटकना पड़ता है। यहां आज भी सामंती ताकतें निरीह लोगों पर जुल्म ढाती हैं। 60 के दशक में मोहर सिंह, मान सिंह, रामआसरे तिवारी फक्कड़, कुसमा नाइन, जगजीवन परिहार, दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर, पहलवान गुर्जर, सीमा परिहार, लालाराम, जगजीवन परिहार, अरविंद गुर्जर जैसे न जाने कितने गिरोह बीहड़ में रहे और चार दशक से अधिक समय तक इनकी बीहड़ में समांतर सत्ता चली। चुनाव से लेकर फरमान जारी करना और बीहड़ की जनता उनके फरमानों को मानने पर विवश रहती थी। लेकिन, बदले हालत में वर्ष 2004 में अरविंद गुर्जर व रामवीर गुर्जर के भिंड में आत्मसमर्पण के बाद, गैंगवार में पहलवान की मौत एवं निर्भय की मुठभेड़ के बाद बीहड़ में खुशियां लौटी थी।

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