तरक्की के लिए तलवार नहीं तालीम दें

Hathras Updated Sun, 21 Oct 2012 12:00 PM IST
हाथरस। मुसलिम समाज के लोग दिल से काम करते हैं, दिमाग से नहीं। अब समय आ गया है कि हमें अपने दिमाग का अपनी अवाम एवं मुसलिम समाज के विकास के लिए इस्तेमाल करना होगा। उर्दू हमारी तहजीब की पहचान है और यह हिंदुस्तान की जुबान है, किसी मुसलमान विशेष की नहीं। यह विचार शनिवार को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एमएस एजाज सिद्दीकी ने स्थानीय परसारा स्थिति साइमा मंसूर पब्लिक स्कूल के लाइब्रेरी के शुभारंभ के मौके पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। जस्टिस सिद्दीकी ने केंद्रीय सरकार द्वारा अल्पसंख्यक समाज के लिए दी जा रही अनेक सुविधाओं के बारे में जानकारी दी तथा दावा किया कि इन सभी सुविधाओं का अल्पसंख्यक समाज के लोग अक्लमंदी से लाभ नहीं उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज के दौर में तरक्की करनी है तो अपने बच्चों को अच्छी तालीम दें। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने शिक्षा की महत्ता को पहचान लिया वे कहां से कहां पहुंच गए, लेकिन आप आज भी तलवार लिए बैठे हैं। जस्टिस सिद्दीकी ने कहा कि आपको अपने हक के लिए शिकायत नहीं करनी है, क्योंकि शिकायत शिकस्त का दूसरा रूप है। आप तालीम से भेदभाव खत्म कर सकते हैं। डॉ. शाइस्ता गफ्फार ने अल्पसंख्यक समाज को बालिका शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने पर जोर दिया। इस मौके पर प्रो. अब्दुल सलीम सलाउल्लाह खां, प्रो. शाकिया सिद्दीकी, प्रो. नसीर अहमद, वकार जाफरी, मोहम्मद शाहवान, नजीर अहमद आदि ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। कार्यक्रम के अंत में विद्यालय की प्रधानाचार्या अर्सी अजीज ने कार्यक्रम के विधिवत समापन की घोषणा की। इस मौके पर बच्चाें ने स्वागत गान के अलावा अनेक आकर्षक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एमएस एजाज सिद्दकी ने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्था को अल्पसंख्यक का प्रमाण पत्र जारी करने के लिए दो रुपये का टिकट भी नहीं लगता है। आवश्यकता है कि लोग आयोग के सामने आवेदन करें। अन्य बोर्डों से मान्यता के नाम पर लोग लाखों रुपया खर्च कर सकते हैं, लेकिन अल्पसंख्यक आयोग को आवेदन भी नहीं कर सकते। अल्पसंख्यक समाज के विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति प्रबंध समिति करे और डीआईओएस से वेतन जारी करने की मांग करें। लेकिन देखने में आता है कि लोग गलत प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हैं। लोग नियुक्ति के लिए पहले डीआईओएस से परमीशन मांगते हैं। बस इसी फेर में डीआईओएस को लाखों रुपया दे देते हैं। उन्होंने बताया कि जब आप अल्पसंख्यक समाज के लिए किसी संस्था की मान्यता लेने जा रहे हैं तो उसमें संबधित धर्म का प्रयोग करना आवश्यक है। दोनों हाथों में लड्डू नहीं चलेगा। अगर सोसाइटी के संविधान में धर्म का नाम नहीं खुलेगा तो उस संस्था को अल्पसंख्यक संस्था की मान्यता नहीं दी जा सकेगी। उन्होंने कहा कि सरकार का काम मदरसा खोलना नहीं है। सरकार स्कूल खोलती है, जो हर ग्राम पंचायत में सामान्यतया खोले जा चुके हैं। किसी स्कूल में उर्दू को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं है तो लोग आयोग में आ सकते है। शिक्षकों की तैनाती कराई जाएगी।

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