...फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

Hathras Updated Sun, 21 Oct 2012 12:00 PM IST
सासनी। सात समंदर पार जाकर विदेशों में जा बसे भारतीयों के दिल में आज भी मातृभूमि के प्रति उतना ही प्यार है जितना कि भारत में रहने वाले लोगों को। किसी जमाने में अंग्रेजों के गुलाम होकर फिजी जा बसे एक परिवार की सातवीं पीढ़ी भारत आकर अपने पूर्वजों की जन्मभूमि ढूंढ रही है। प्रवासी भारतीय युवती अपनी मां के साथ भूलवश असरोही को हरोली समझ कर आगरा से सासनी आ गई थी, बाद में गलती का अहसास होने पर वह पुन: अपने पूर्वजों को ढूंढने का संकल्प लेकर असरोही रवाना हो गई। न्यूजीलैंड निवासी कुमारी आरती अपनी वृद्ध मां सरिता देवी के साथ हरोली का पता पूछते-पूछते सासनी थाने आ गई थी। अंग्रेजी के साथ-साथ धाराप्रवाह हिंदी बोल रही आरती ने बताया कि भारत भ्रमण का एक मात्र उद्देश्य अपने नाते रिश्तेदारों एवं सगे संबंधियों की खोज कर मुलाकात करना है। इसी क्रम में उन्होंने अपने एक निकट संबंधी को जनपद आगरा के बाह क्षेत्र में खोज निकाला है। उसका कहना था कि अभी तक मैंने इस देश की खूबियों को सिर्फ सुना था, लेकिन यहां आकर जो अपनत्व, प्यार दुलार मिला उसने मेरी परिकल्पना को साकार कर दिया। आरती अपने साथ 30 मार्च 1900 का अंग्रेजों द्वारा निर्गत प्रमाण पत्र लिए हुए थी, जिस पर करन सिंह पुत्र चेतराम सिंह उम्र 23 वर्ष असरोही थाना मुरसान जनपद अलीगढ़ अंग्रेजी में लिखा था। जिसे वह हरोली समझ कर आगरा से सासनी आयी थी। थाने से वह गाँव की भौगोलिक स्थिति की जानकारी करना चाहती थी। दरोगा मान पाल सिंह ने भी अतिथियों की खातिरदारी करते हुए उन्हें भारतीय संस्कृति का भान कराया। आरती ने बताया कि उनके पूर्वज करन सिंह को वर्ष 1900 में अंग्रेज 5 वर्ष के लिए-इंडेचर लेबर सिस्टम के तहत फिजी ले गए थे। लेकिन गुलाम को कोई अधिकार नहीं थे। इसी कारण उनके पूर्वज वहीं के बाशिंदे बन कर रह गए। 112 साल के अंतराल में सात पीढ़ियां बदल गयीं। मैंने छात्र जीवन में कसम खाई थी कि भारत में निवास करने वाले अपने पूर्वजों को खोज निकालूंगी। इसी कसम को पूरा करने आयी हूँ। मां-बेटी दोनों इसके बाद सासनी से वापस असरोई के लिए रवाना हो गईं।

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