तालाब में बह गए 37 लाख

Hathras Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
हाथरस। शहर के बीचों-बीच का तालाब फिलहाल सत्ता के बदलाव की कहानी बयां कर रहा है। पिछली सरकार के कार्यकाल में इस तालाब को सुखाने के लिए 37 लाख रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, वहीं अब इस तालाब में फिर बारिश का गंदा पानी भर गया है। 37 लाख रुपये महज शहर के लोगों को ‘दर्द’ देने के लिए खर्च कर दिए गए। पिछली सरकार के समय में इस तालाब के सौंदर्यीकरण की योजना पर काम हुआ था। इस तालाब को बहन जी के ‘सपनों का तालाब’ बनाना था, लेकिन सत्ता बदली तो योजना भी ठंडे बस्ते में चली गई।
योजना पूरी नहीं हुई और जितनी धनराशि खर्च की गई, उसकी वजह से अब स्थिति यह हो गई है कि जब बारिश होती है कि तो शहर में कई गली-मोहल्लों में तालाब जितना ही गंदा पानी भर जाता है। सीधा सा मतलब यह है कि इस तालाब के सौंदर्यीकरण की योजना तो पूरी हुई नहीं, बल्कि इस योजना के अधर में लटकने की वजह से अन्य इलाकों में और गंदगी फैलनी शुरू हो गई है।
शहर के बीचों-बीच काफी बड़ा तालाब है। डेढ़ साल पहले तक आधे से ज्यादा शहर का गंदा पानी इसी तालाब में जाता था। डेढ़ साल पहले जब तत्कालीन सीएम मायावती यहां आई तो उन्होंने शहर के कई इलाकों का निरीक्षण किया था। उनके निर्देश पर इस तालाब को पिकनिक प्लेस बनाने की योजना पर अमल शुरू हो गया। सबसे पहले यह प्लानिंग की गई कि तालाब में आने वाले गंदे पानी को आखिर कहां निकाला जाए। इसके लिए भूमिगत नाले का प्रस्ताव तैयार हुआ। तालाब में जाने वाले पानी को इस भूमिगत नाले से होकर खातीखाना ड्रेन में मिलाने की योजना बनी। इस पर काम भी हुआ और भूमिगत नाला बनकर तैयार भी हो गया। इस पर 37 लाख का खर्च आया। यह काम लोनिवि ने कराया, जबकि धनराशि नगर पालिका की खर्च हुई।
यह भूमिगत नाला बना तो दिया, लेकिन इस नाले में इतना स्पेस नहीं हैं कि वह इस तालाब में आने वाले पूरे गंदे पानी को खातीखाना ड्रेन तक पहुंचा सके। वहीं दूसरी ओर खातीखाना ड्रेन पहले से ही ओवरफ्लो रहता है। ऐसे में जब बारिश होती है तो शहर के खातीखाना, होली वाली गली सहित कई इलाकों की स्थिति तालाब सरीखी ही हो जाती है। अब सवाल यह है कि जिस उद्देश्य से यह नाला बनाया गया वह उद्देश्य अधर में ही लटका है। तालाब में पिकनिक प्लेस की योजना पर आगे काम ही नहीं हुआ। अब स्थिति यह हो गई है कि बारिश के अलावा आसपास का गंदा पानी फिर तालाब में जाने लगा है। न तो तालाब का सुंदरीकरण हुआ न ही जलभराव की समस्या का समाधान हुआ। 37 लाख खर्च करने के बाद लोगों की मुसीबतें और बढ़ गई हैं।

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