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मानसून में देरी से अन्नदाता के माथे पर गहराई चिंता

Hathras Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
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हाथरस। मानसून में देरी की भविष्यवाणी ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। किसानों के सामने न केवल मौजूदा फसल को बचाने की चुनौती है, बल्कि खरीफ की फसलों की बुवाई पर भी संकट के बादल नजर आ रहे हैं। नहर-रजवाहों में पानी नहीं है। बिजली की खस्ताहालत से नलकूपों से भी सिंचाई के लिए पानी की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही। ऐसे में किसानों की पूरी आस अब मानसून पर ही टिकी है। अगर मानसून भी रूठ गया तो निश्चित रूप से जिले में सूखे के हालात पैदा हो जाएंगे।
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जानकारों की मानें तो मौसम के हिसाब से तो अब तक मानसून की आमद हो जानी चाहिए थी, लेकिन बार-बार ठिठकने से मानसून लेट होता जा रहा है, जबकि किसानों की खरीफ की पूरी फसल ही मानसून के भरोसे होती है। मानसून की बारिश से ही खेतों को नई बुवाई लायक नमी मिल पाती है और बारिश के पानी से ही यह फसल खेतों में जम पाती है। इसके बाद बारिश के सहारे ही यह फसल पनपती है। चूंकि इन-दिनों जिले के किसान जबर्दस्त बिजली संकट के अलावा नहर, रजवाहे और माइनरों में भी पानी के संकट से जूझ रहे हैं, इसलिए उनके लिए मानसून की जरूरत और बढ़ गई है, लेकिन इस बार मानसून किसानों को सबसे ज्यादा तड़फा रहा है। गौरतलब है कि खरीफ सीजन में ही किसान बाजरा, दलहन, मक्का, चरी के अलावा सबसे ज्यादा पानी की खपत वाली धान की फसल की बुवाई करते हैं।धान की नर्सरी के लिए तो किसानों को पल-पल की जरूरत होती है, लेकिन इस बार सिकंदराराऊ, हसायन, सादाबाद और सहपऊ के धान उत्पादक किसानों के सामने यह चिंता है कि वह धान के लिए पानी कहां से लाएंगे। हो सकता है कि इस बार किसान धान की पैदावार में ही कमी कर दें। सादाबाद, सहपऊ और सासनी जैसे जिन गैर परंपरागत क्षेत्रों में पिछली बार धान की बुवाई की गई थी, वहां के किसान धान की खेती से मुंह मोड़ सकते हैं। यही वजह है कि अभी तक इन क्षेत्रों के किसानोें ने धान की नर्सरी की तैयारी ही शुरू नहीं की
मानसून की देरी से फसलों के लिए नमी का संकट गहरा सकता है। नमी न मिलने से चरी की फसल में साइनाइट की मात्रा बढ़ जाएगी और वह जहरीली हो जाएगी। धान की पैदावार पर भी इसका बुरा असर होगा।
डॉ.श्याम सिंह, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, हाथरस

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