64 साल बाद भी कायम अंग्रेजी कानूनों का ‘राज’

Hathras Updated Sun, 26 Jan 2014 05:44 AM IST
हाथरस। देश को गणतंत्र हुए 64 साल बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक देश में ज्यादातर कानून अंग्रेजों के जमाने के ही चल रहे हैं। अब स्थिति यह है कि बडे़ अपराधाें में भी वही कानून चले आ रहे हैं, जिसका लाभ अपराधियों को मिल रहा है। अधिवक्ता और बुद्धजीवी मानते हैं कि ऐसे कानूनों में बदलाव की जरूरत है। इसके साथ ही आम आदमी को जागरूक करने की आवश्यकता है। रेल भी लंबे अरसे से उन्हीं पुराने नियम-कानूनों के हिसाब से चल रही है। इन कानूनों का माल भाडे़ में कुछ जानकार मोटा लाभ कमा रहे हैं, जबकि आम जनता का कानूनों की जानकारी के अभाव में दोहन हो रहा है। रेलवे में ट्रेनों का संचालन बढ़ाने के साथ-साथ पुराने कानूनों में काफी बदलाव की गुंजाइश है, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। उदहारण के तौर पर रेलवे में पीली धातु का मालभाड़ा एक समान है, जिसमें आप चाहें तो पीतल ले जाएं या फिर सोना। दोनों पर मालभाड़ा बराबर ही लिया जाएगा। सिंचाई विभाग का देश में वर्ष 1873 में उत्तरी भारत नहरी एवं नाला अधिनियम कानून बना, जिसमें नहर और नाले आदि की पटरी तोड़ने पर अर्थदंड का प्रावधान है। यह पैनाल्टी 50 रुपये और अधिकतम 100 रुपये तक हो सकती है।
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तकनीकी का विकास दोधारी तलवार
पीसी बागला कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग के रीडर डॉ.राजकमल दीक्षित का कहना है कि गणतंत्र हम मनाएं, लेकिन इसका उद्देश्य समाज में सोच परिवर्तन होना चाहिए। 21वीं सदी को हम आधुनिक कहते हैं। हमने तरक्की भी की है। जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से हम अपनी बात देश के किसी भी हिस्से में पहुंचा सकते है। यह एक अच्छी बात है, लेकिन सोशल मीडिया के खुलासे के बाद लोग आत्महत्या भी कर रहे हैं। पुराने कानूनों में समय की आवश्यकता को देखते हुए बदलाव किया जाना चाहिए, जिससे समाज को सकारात्मक सोच मिल सके। नैतिक मूल्यों को अब हमारे भौतिकवाद ने खत्म कर दिया है। इस प्रकार के विकास को हम दोधारी तलवार भी कह सकते हैं।
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रेलवे कानूनों को व्यवहारिक बनाया जाए
रेलवे परामर्शदात्री समिति के पूर्व सदस्य दिनेश सरदाना का कहना है कि आम आदमी को राहत देने के लिए जहां प्राइवेट ट्रांसपोर्ट अधिक सुगम बना रहे हैं, लेकिन रेलवे के दकियानूसी कानून जैसे पीली धातु का एकसमान भाड़ा लागू होना और स्टेशनों पर ही वैैगन और रैक की सुविधा दिया जाना व्यवहारिक नहीं है। आम आदमी को अंग्रेजों के जमाने के कानून से नहीं, बल्कि व्यवहारिक नीति बनाकर लाभ पहुंचा चाहिए। हाथरस किला से ट्रेनों की सुविधा बढ़ाने के स्थान पर कम और की जा रही हैं। यहां से चलने वाली किला ट्रेन बंद कर दी गई है, जिससे लोगों को प्राइवेट वाहनों से आना-जाना पड़ रहा है।

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