वाटर लेविल गिरा तो पानी पर लगा पहरा

Hathras Updated Tue, 26 Nov 2013 05:40 AM IST
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हाथरस। तालाब और पोखरों पर जिस तरह कब्जे हुए हैं, उससे पर्यावरण संतुलन तो बिगड़ा ही है। साथ ही पानी की किल्लत भी गहरा गई है। यही कारण है कि हाथरस में पानी पर पहरा लगा हुआ है। यह क्षेत्र डार्क जोन घोषित है। पोखर और तालाबों में यदि वर्षा जल संचय की व्यवस्था रहती तो भूजल स्तर सही रहता है। अब तो पोखर बची भी हैं, उनमें इतना गंदा पानी भरा हुआ है कि इसकी वजह से भूजल दूषित भी होता जा रहा है। बिन पानी सब सून। यह कहावत सदियों पुरानी है। वर्तमान में जब तालाब-पोखरों की स्थिति बिगड़ी तो पानी की व्यवस्था भी बिगड़ गई। कभी स्वच्छ पानी शहर की आधा दर्जन पोखरों में भरा रहता था, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में हेराफेरी कर इनका अस्तित्व खत्म किया गया। इसके बाद पर्यावरण संतुलन बिगड़ा। पानी की किल्लत भी सामने खड़ी होने लगी। आज स्थिति यह है कि हाथरस ब्लॅाक डार्क जोन घोषित है। यहां पानी पर पहरेदारी है। बिना शासन की अनुमति के यहां जलस्रोत चालू नहीं किए जा सकते। 65 से 70 फीट गहराई पर यहां पानी मिलता है और कई इलाकों में तो यह पानी खारी होता है। वर्षा जल संचय के प्रबंधन के नाम पर यहां लाखों की योजना बनाई जा रही हैं, लेकिन पोखरों को बचाने की कोई योजना न प्रशासन के दिमाग में आई और न नगर पालिका के। और तो और गंदा पानी जब तालाब और पोखरों में जाने लगा तो आसपास का वातावरण भी दूषित होने लगा। जो पोखरें बची हैं, उनमें इतना गंदा पानी भर गया है कि वहां आसपास का भूजल भी दूषित हो गया है। इनकी सालों से सफाई नहीं कराई गई और नही सौंदर्यीक रण की योजना बनाई। कई बार यह बात सामने आई भी है। वैसे सालों से यहां नगर पालिका प्रशासन ने शहर के पानी के नमूने ही नहीं लिए हैं। आरटीआई एक्टिविस्ट गौरव अग्रवाल ने नगर पालिका प्रशासन और जिला प्रशासन से आरटीआई के तहत यह जानकारी मांगी है कि शहर में आजादी से पहले कितनी पोखर और तालाब थे। इस समय कितने तालाब और पोखर हैं। इसका राजस्व लेखा-जोखा क्या है। इस समय कितने तालाब और पोखर पूरी तरह से सुरक्षित हैं।
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