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अब केंद्र की नजरों से बच न पाएंगे ‘बच्चों के फावड़े’

Hardoi Updated Wed, 22 Aug 2012 12:00 PM IST
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‘यह भी खूब रही। अब मनरेगा में काम करने वाले यदि अपनी उम्र के 17 साल पूरे कर चुके होंगे और यहां फावड़ा चलाना चाहेंगे, तो भी काम नहीं कर सकेंगे, क्योंकि उनके काम करते यदि अधिकारी की नजर उन पर पड़ गई तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई तय है, क्योंकि केंद्र के सख्त निर्देश के बाद शासन ने भी पत्र जारी कर साफ तौर पर प्रदेश भर के डीएम व सीडीओ को निर्देशित कर दिया कि मनरेगा में 18 साल से कम उम्र के मजदूरों से काम न लिया जाए। साइटों पर इसका विशेष ध्यान रखा जाए। इसे मनरेगा का दुर्भाग्य कहा जाए या एक उम्र को लांघ चुके बुजुर्गों का सौभाग्य कि या तो मनरेगा में बुजुर्ग ही ज्यादातर फावड़ा चलाने को मजबूर हैं या फिर 15 से 17 साल के किशोर 18 साल की उम्र का जॉबकार्ड बनाकर फावड़ा चला रहे हैं, पर इस ओर केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है और प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर बच्चों से काम न लेने के निर्देश दिए हैं। संबंधित अफसरों को भी ज्यादा उम्र बताकर कम उम्र वाले किशोरों के मनरेगा में काम करने वालों पर आपत्ति दर्ज करवाने को कहा गया है।’
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हरदोई। केंद्र सरकार के निर्देश मिलने के बाद प्रदेश सरकार द्वारा भी इन निर्देशों को अमली जामा पहनाने को सख्ती से जिलों के अफसरों को प्रेषित कर दिया गया है। सभी डीएम और सीडीओ को भेजे निर्देशों में मनरेगा के कार्यों में 18 साल से कम उम्र के बच्चों से काम लेने को मना कर दिया गया है। जिले में पत्र के पहुंचने के बाद संबंधित ब्लाकों में निर्देशों का पालन करने को प्रेषित कर दिया गया है। उधर, मनरेगा के तहत जिले में ज्यादा उम्र बताकर भी जरूरतमंद किशोर फावड़ा चला रहे हैं।
15 की उम्र में भी किशोर अपनी आयु को छिपाकर जॉब कार्डों को बनवा रहे हैं। इस बाबत ग्राम पंचायतों के पास भी कोई साक्ष्य नहीं है। ग्राम पंचायत अफसरों का कहना है कि उनको मनरेगा में जॉब कार्ड बनवाने को एक प्रारूप पर प्रार्थना पत्र दिया जाता है। प्रार्थना पत्र पर जितनी आयु वह लिख देते हैं, उतनी मान ली जाती है। कोई 60 साल का है और वह अपनी उम्र 40 की बता रहा है, तब तो अंदाजा लग जाता है, पर यदि 16 साल का 18 बता रहा है, तो मानना पड़ता है। उधर, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही जिले में 18 से 30 के मध्य जॉब कार्ड धारकों की उम्र पूरे 19 ब्लाकों में 20 हजार 473 है। सूत्रों की मानें तो कम से कम पांच से छह हजार के मध्य जॉब कार्ड धारक तो ऐसे होंगे ही जो आयु को 18 या 19 दर्शा रहे होंगे, जबकि वास्तविकता में उनकी आयु 18 से कम ही रह रही होगी।
इंसेट
18 से 30 के बीच के जाब कार्डधारकों में अहिरोरी ब्लाक में 1045, बावन में 1071, बेेहंदर में 925, भरावन में 1085, भरखनी में 1291, बिलग्राम में 1415, हरियावां में 717, हरपालपुर में 1119, कछौना में 656, कोथावां में 1347, माधौगंज में 584, मल्लावां में 401, पिहानी में 1666, सांडी में 1312, संडीला में 1177, शाहाबाद में 1437, सुरसा में 1491, टड़ियावां में 663 और टोडरपुर ब्लाक में 1071।
इंसेट
जिले की साक्षरता शहरी क्षेत्र शाहाबाद में 45,392, पिहानी में 19,607, गोपामऊ में 7,090, हरदोई में 1,45,999, पाली में 10,388, सांडी में 15,608, बिलग्राम में 18,146, माधौगंज में 8,311, मल्लावां में 22,610, कुरसठ में 4301, कछौना में 10,426 में बेनीगंज में 6,872 और संडीला में 33,660 साक्षर।
इंसेट
साहब! 18 के पूरे होने तक भूखे ही रहेंगे
हरदोई। 18 साल के नहीं हुए तो यह इनका दोष नहीं है, क्योंकि इनका दोष इतना है कि वह गरीब है और उनके अपना पेट भरने को सिर्फ मेहनत का ही सहारा है, क्योंकि छोटे थे तो करोड़ों अरबों की योजनाएं हर साल आती और जाती रहीं, पर एक दमड़ी भी जिले का प्रशासन उन पर नहीं लगा सका, इसलिए इनका तो कहना है कि जब नहीं है कोई उनका सहारा, तो 18 के हो या 14 के पेट तो किसी न किसी तरह भरना ही है। सर्व शिक्षा अभियान जैसी करोड़ों अरबों रुपए क ी योजनाएं भी फिलहाल इस तरफ विफल साबित हो रही है। आज भी राह चलते बच्चे न सिर्फ बेबसी पर आंसू बहाते नजर आते हैं, बल्कि अभियानों की भी खिल्ली उड़ाते दिखते हैं।
इंसेट
केस 1
अगर पढ़ने जाऊंगा तो खाना कैसे खिलाऊंगा
हरदोई। सड़कों पर कू ड़े आदि को बीनकर उनमें अपना भविष्य और रोटी खोजने वाले छोटू से जब पूछा गया तो उनका कहना था कि पढ़ना वह चाहता है, पर अगर पढ़ेगा तो खाएगा क्या। पालीथिन आदि बेंचकर ही तो वह अपना व मां का पेट भर पाता है।
केस 2
जूठे बर्तनों के साथ घिस रहा राजू का भविष्य
हरदोई। एक होटल में सुबह से शाम बर्तनों को साफ करने में ही समय व्यतीत करने वाले राजू से जब सवाल दोहराया गया कि वह पढ़ना चाहता है कि नहीं तो उसने जवाब दिया कि आज तक तो किसी ने पूछा नहीं यह सवाल। बोला कि हम अब पढ़ाई कहां कर पाएंगे, अब तो बर्तन मांज कर ही पेट पालना है।
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केस 3
अपने पेट की खातिर गफ्फार कस रहा है पेंच
हरदोई। गाड़ी के नट बोल्ट कसने वाले गफ्फार से जब पूछा गया कि वह स्कूल क्यों नहीं जाता तो जवाब था कि आज तक न उनसे किसी ने जाने को कहा। न ही स्कूल जाने की आर्थिक क्षमता थी। किसी को स्कूल जाते देख उनके मन में भी किताबों को लेकर रुचि पैदा होती थी, पर वक्त के साथ इच्छाएं भी समाप्त होती गईं।

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