80 बरस बाद बापू के सपने को लगेंगे ‘पर’

Hardoi Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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‘80 साल बाद बापू की खादी में आधुनिकीकरण का तागा पिरोकर एक ब्रांड के रूप में पेश किया जाएगा। आजादी की 65 साल पूरे होने पर पूरे देश में बापू के इस सपने को पूरा करने को एक कदम आगे बढ़ाया गया है। प्रदेश में ही 4.30 करोड़ से ज्यादा की राशि को आवंटित कर न सिर्फ खादी को नया लुक देने की रणनीति तय कर दी गई है, बल्कि वस्त्रों के अन्य शोरूमों से टक्कर लेने को स्टोर आउट लेट नवीनीकरण से लेकर पारंपरिक चरखों तक को बदलने की योजना को मंजूरी दे दी गई है। खादी के आधुनिक सेंटरों पर बिक्री भी वार्कोडिंग सिस्टम के तहत की जाएगी। एशियन विकास बैंक से सहायता प्राप्त खादी रिफार्म डेवलपमेंट प्रोग्राम की काफी वर्षों पहले ही नींव रखी जा चुकी है। पूर्व में ही बजट से लेकर खादी को न सिर्फ अपने देश में ही, बल्कि विदेश में भी एक चरम पर पहुंचाने को लेकर रणनीति तय की गई थी, पर बजट का आवंटन नहीं हो पा रहा था। अब पूरे देश में जहां योजना को लेकर धन का आवंटन किया जा रहा, वहीं यूपी के चार संस्थानों को 4.30 करोड़ से ज्यादा का आवंटन कर दिया गया है। प्रोजेक्ट में 4.50 लाख की कीमत से 10 गरीब महिलाओं को काम को वर्क शेड प्रदान करने का भी प्रावधान है और जिले के लिए 10 वर्क शेडों का निर्माण करवाया जाएगा।’
हरदोई। इस लंबे प्रोजेक्ट को लेकर पूरी भूमिका भी तय कर दी गई है। प्रोग्राम के राज्य निदेशक द्वारा चारों संगठनों को पूरी रणनीति के साथ धन का आवंटन कर दिया गया है, जिस पर संबंधित संस्थानों के जिम्मेदारों द्वारा काम भी शुरू कर दिया गया है। सबसे ज्यादा धन का आवंटन हरदोई के भूरज सेवा संस्थान को ही किया गया है। इस संस्थान को 1,07,69,000 रुपए मिले हैं।
ग्रामीण विकास आश्रम, नैपालपुर, सीतापुर को 1,06,23,000, विनोवा ग्रामोद्योग, कौशल भवन, शास्त्री नगर बांदा को 1,01,43,000 एवं क्षेत्रीय गांधी आश्रम, नैपालपुर, सीतापुर को 1,06,48,000 रुपए का आवंटन किया गया है। इस धनराशि से पुराने जमाने से चले आरे चरखों की जगह आधुनिक चरखों को लाया जाएगा। जिससे उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ गुणवत्ता को भी बढ़ाया जाएगा। काफी वर्षों बाद खादी के लिए आई नई क्रांति से न सिर्फ इनसे जुड़े लोग हर्ष महसूस कर रहे हैं, बल्कि आम जनमानस में भी बापू के सपने को साकार होते देख अपने आपमें भारतीय होने पर गर्व महसूस कर रहे हैं। उधर, भूरज सेवा संस्थान के अशोक उपाध्याय ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में खादी को ही नहीं, इससे जुड़ी हर चीज को आधुनिक करने की कोशिश की जा रही है।
पूरे देश में खादी के बड़े 53 संस्थानों में एक सर्वर से जोड़ कर आन लाइन कर दिया जाएगा। सेंटरों पर बिक्री भी माल में होने वाली खरीददारी के पैटर्न पर वार्कोडिंग सिस्टम के हिसाब से ही होगी। मांगी जानी वाले सूचनाओं आदि को भी आनलाइन ही मांगा जाता रहेगा। इस प्रोजेक्ट के आने के बाद चरखों की संख्या जिले में ही 150 हो जाएगी। इससे इस पर काम करने वाले श्रमिकों की संख्या बढ़ाई जाएगी। नई महिला श्रमिकों की जरूरत होगी उनको रोजगार प्राप्त होगा। एक महिला प्रतिदिन 125 रुपए से ज्यादा कमा सकती है। उधर, जिले में 15 लाख खर्च कर 150 आधुनिक चरखों की होगी खरीद, तीन लाख 75 हजार से लाए जाएंगे 15 करघे, 5 लाख कीमत से होगा वर्कशेड निर्माण, 8 लाख की कीमत से स्टोर आउट लेट नवीनीकरण, प्रबंधन पर 14 लाख, कच्चे माल की उपलब्धता को 14 लाख, कामन फेसेलटी सेंटर को आठ लाख, दुकानों के लिए छह लाख और अन्य आधुनीकीकरण किया जाएगा।
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साढ़े चार सौ महिलाओं को खादी खिलाती रोटी
हरदोई। साढ़े चार सौ महिलाओं के परिवारों को खादी ही पिछले कई सालों से रोटी मुहैया करवाती आ रही है। भूरज सेवा संस्थान में ही महिला श्रमिकों व बुनकरों की संख्या अब बढ़कर साढ़े चार सौ से ज्यादा हो गई है, जो प्रतिदिन यहां चरखे से आधा किलो से ज्यादा खादी को तैयार कर सौ रुपए दिहाड़ी तक कमा लेती है और अपने परिवार का भरण पोषण कर लेती है।
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मार्केट विकास सहायता से जुड़े अहम तत्व---
खादी की बिक्री बढ़ाने को समितियों की सिफारिशों पर केंद्र सरकार के प्रयासों के बाद रिबेट योजना के स्थान पर उत्पादन पर मार्केट विकास सहायता योजना को लागू करने का निर्णय लिया गया है।
प्रमाणित संस्थाओं द्वारा किए गए खादी और पालीवस्त्र के उत्पादन मूल्य पर सहायता प्रदान की जाएगी। केवल वह खादी संस्थाएं जिनके पास वैद्य खादी प्रमाण पत्र होगा।
संपूर्ण रकम का दावा उत्पादक संस्थाओं द्वारा आयोग से उत्पादन पर किया जाएगा। रकम को अंश धारकों जैसे कि कत्तिनों और बुनकरों और उत्पादक तथा बिक्री संस्थाओं के बीच 25 प्रतिशत, 30 प्रतिशत एवं 45 प्रतिशत के हिसाब से बांट दिया जाएगा।
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विदेशियों के बदन पर भी फबेगी आधुनिक खादी
हरदोई। अबकी गांधीजी का सपना पूरा करने को केंद्र सरकार ने रणनीति तय कर दी है। यही नहीं हर शख्स तक खादी की पहुंच बनाने को न सिर्फ चरखों की जगहों पर अब कंप्यूटरीकृत मशीनों से खादी तैयार की जाएगी, बल्कि भारत की खादी को अन्य देशों में भी निर्यात करने को एमडीए योजना मार्केट प्लान को भी प्रभावी किया जाएगा।
बापू ने अपना मकसद पूरा करने को वर्ष 1932 के आस पास खादी को ढूंढ निकाला और देश में ही अपने चरखे से कातकर खादी को पहनने का आह्वान किया। इनके इस काम को आगे बढ़ाया आचार्य देवी कृपलानी ने। चरखा व खादी की गूंज पूरे देश में एक आग व जरूरत की तरह फैल गई। हर जगह गांधी जी को मानने वालों ने खादी बुनना व पहनना शुरू कर दिया, पर वक्त की करवट में खादी व चरखे तो रहे, पर पहनने वाले तो कम ही हो गए, बल्कि जो पहनना चाहते हैं, वह गरीब तबका इसकी ऊंची होती जा रही कीमतों के कारण इससे लगातार दूर होता चला गया। आलम यह आया कि गांधी जी का सपना टूट गया, पर हाल में ही मार्केट सहायता यानी एमडीए योजना को हरी झंडी दे दी गई है।
इसका प्रधान कार्यालय मलेशिया में बनाने की बात की जा रही है। भारत से ही 300 संस्थाओं का चयन किया गया है। जिनमें लखनऊ मंडल की ही चार संस्थाओं को जगह मिली जिनमें सीतापुर व बांदा के अलावा हरदोई की भूरज सेवा संस्थान भी है। चयनित संस्था के अध्यक्ष पन्ना लाल शर्मा ने बताया कि योजना में 26 देश मिलकर गांधीजी के समय की खादी को अब कंप्यूटरीकृत मशीनों से पतली तैयार की जाएगी और निश्चित रूप से इसकी कीमतों में कमी लाने का प्रयास किया जाएगा। विदेशों में न्यूयार्क आदि में प्लाजा आदि खोलने के बाद पूरी संभावना है कि विदेशियों के तन पर भी खादी फबती नजर आएगी।

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