पेट पर भूख का डाका, बचपन का बेबसी से नाता

Hardoi Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
‘गरीब आज सिर्फ बाजारों में महंगाई की गिरफ्त में सजी दालों को देखकर ही अपना पेट भर रहा है, तो बचपन मुफलिसी की रस्सियों में जकड़ा जूठे बर्तन में कराह रहा है और वहीं बुढ़ापा अपनी बेबसी में रोकर बोझ ढोकर कीमती रोटी कमा रहा है, फिर भी यदि हम स्वतंत्र समाज में सांसे लेने का दम भरे तो खुद पर ही हैरानी होगी। इसे दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य आज हम भले ही अंग्रेजों के चंगुल से अपने आपको आजाद होने के 65 साल पूरे होने पर जश्न मनाने जा रहे हैं, पर समाज का आईना देखकर क्या सचमुच हम कह सकते हैं कि हम आजाद हैं। इस ओर समाज शास्त्रियों का कहना है कि जिस समाज में आज किसी कारणवश रोजी-रोटी से लेकर यदि बीच राह महिलाओं को आजादी से चलना भी मुश्किल हो, तो हम दावे से कह सकते हैं कि हम आज भी गुलाम हैं। ऐसी स्वतंत्रता जिसमें दिनदहाड़े भी आप अपने शहर की सड़कों पर सुरक्षित नहीं हैं और इस पर भी हम अपने को स्वतंत्र कहें तो हम कैसे यह दावा कर दें। अंग्रेजी हुकूमत से लोगों को निजात मिली, पर यहीं के लोगों के अंदर उसके बाद अपराध की प्रवृत्ति जन्म लेने लगी और आलम यह हो गया कि अपराधों का ग्र्राफ लगातार बढ़ा चला गया। चोरी से लेकर लूट तक का तो ग्राफ बढ़ा ही, इसके अलावा महिलाओं पर अत्याचार व अपराधों ने तेजी पकड़ ली। कुछ अपराधों में ऐसे बढ़ोतरी हुई कि महिलाओं व किशोरियों को घरों में ही कैद होकर रह जाना पड़ रहा है।’
इस बचपन को नहीं मालूम, आजाद कैसे हुए
हरदोई। इन्हें नहीं मालूम कि आजादी क्या है और कैसे मिली। इन्हें यह भी नहीं मालूम कि क, ख, ग, घ क्या होता है। इन्हें सिर्फ यह मालूम है कि उन्हें दिन भर काम करना है और अपने पेट की भूख शांत करना है, तभी जाकर वह अपने पेट के साथ न्याय कर पाएंगे। एक ढाबे पर बर्तन मांजते नौ वर्षीय राजू को देखा और पूछा कि आजादी क्या होती है, तो वह हंस पड़ा और न में सर हिलाकर बोला कि वह नहीं जानता। उसने यह ही बताया कि वह सिर्फ यह जानता है कि उसे दिनभर मेहनत करनी है और उसके बाद में अपना पेट भरना है।
नशे की गिरफ्त में सुलगने लगी है जवानी
हरदोई। अब आप ही अंदाजा लगा लीजिए कि क्या आज क ा युवा खुली हवा में सांस ले पा रहा है। आजादी की 65 वीं वर्षगांठ मनाने को युवाओं समेत लगभग सभी लोग तैयारियों में जुटे हुए हैं, पर एक वर्ग ऐसा भी है जो आजादी के जश्न से अपने आप को अलग रखकर नशे की गिरफ्त में है। देसी शराब, बियर, कच्ची शराब व अफीम, चरस, गांजा के बाद अब नशीले इंजेक्शन की मांग भी बढ़ती जा रही है। जवानी इस तरह नशे की गिरफ्त में हैं कि उसके चंगुल से युवा निकल भी पाएंगे, अंदाजा भी लगाना मुश्किल हो गया है।
महंगाई के चंगुल में जकड़ा हुआ आम आदमी
हरदोई। आजादी का जश्न भले ही लोग मना रहे हो। इसे परंपरा कहें या फिर परिपाटी, पर सत्यता यह है कि महंगाई के मामले में भी आम आदमी आज भी खुली हवा में सांस नहीं ले पा रहा है। दाल, चावल, आटा लेकर रोज अपने परिवार का पेट पालना रोज कमाने खाने वालों को काफी मुश्किल हो रहा है, तो दूसरी ओर मध्यम वर्ग के लोगों की थाली से भी इस महंगाई ने व्यंजनों को गायब कर दिया है। कहने का मतलब यह है कि यहां भी निम्न वर्ग से लेकर मध्यम वर्गीय परिवार महंगाई के दबाव में है और महंगाई उनके परिवार पर हावी हो रही है। यहां भी परतंत्रता दिखाई दे रही है।

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