‘बीमार’ अस्पताल में कैसे हो बीमारों का इलाज

Hardoi Updated Fri, 27 Jul 2012 12:00 PM IST
‘शासन बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के तमाम दावे कर रहा है, पर सरकारी अस्पतालों में फैली अव्यवस्था दावों की पोल खोल रही है। जिला अस्पताल में ही अव्यवस्थाओं के अंबार हैं। पर्चा बनवाने से लेकर डॉक्टर को दिखाने और फिर दवा लेने तक मरीजों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। पर्चा बनवाने को लग रही लाइन से मरीज और बीमार हो रहे हैं। ओपीडी में डॉक्टर नहीं बैठते और मरीज तड़पते रहते हैं। अस्पताल में डॉक्टरों की सुबह 8 से 2 बजे तक की ड्यूटी है, पर मात्र दो से तीन घंटेे ही बैठते हैं। लखनऊ से आने वाले डॉक्टर तो ट्रेन के भरोसे हैं। सुबह ट्रेन देर से आई तो देर से आए, पर दोपहर सभी को दो बजे त्रिवेणी एक्सप्रेस से जाना पड़ता है, तो डेढ़ बजे ही मरीज देखना बंद हो जाता है और स्टेशन की ओर कूच कर देते हैं। ’
हरदोई। कहने को तो जिला अस्पताल में तमाम इंतजाम हैं, पर अमर उजाला ने जो देखा वह सारे इंतजामों की पोल खोल रहा है। सुबह साढ़े ग्यारह पर्चा बनवाने को मरीजों की भारी भीड़ थी न कोई लाइन न कोई इंतजाम। कोई किसी को धक्का दे देता तो कोई किसी को। दवा वितरण काउंटर पर महिलाएं खड़ी थी, पर दवा देने वाला कोई नहीं दिखा।
ओपीडी के कक्ष संख्या एक बाल रोग विशेषज्ञ सीट पर तो बैठे थे, पर महिलाओं का कहना था कि डाक्टर साहब ने न तो कुछ पूछा और न सुना। बस पर्चा देखा और कुछ दवा लिखकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। जब बताया तो नाराज से हो गए। कक्ष दो इंजेक्शन रूम में फार्मेसिस्ट विजय तिवारी बैठे मिले। कहने को तो पर्याप्त इंजेक्शन हैं, पर मरीजों के चेहरों का दर्द व्यवस्था बयां कर रहा था। कक्ष तीन में दवा लेने वालों की लंबी-लंबी लाइन थी। न कोई दवा देने की व्यवस्था न कोई इंतजाम। फार्मेसिस्ट आराम कर रहे थे और मरीज तड़प रहे थे। कक्ष चार गुप्त रोग विशेषज्ञ कक्ष में पैथालोजिस्ट डॉक्टर प्रवीन कुमार मरीजों को देख रहे थे। कक्ष पांच नाक कान गला रोग विशेषज्ञ डॉक्टर डीके गुप्ता बैठे थे, पर मरीजों की लंबी लाइन लगी थी।
कक्ष 6 फिजीशियन को दिखाने को मरीजों की भीड़ लगी थी। एक युवक दवा लिख रहा था। पूछने पर बताया कि वह इंटरशिप कर रहेे हैं। डाक्टर साहब चाय पीने गए हैं। कक्ष 7 के फिजीशियन डॉक्टर विष्ण कुमार का स्थानांतरण हो चुका है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर वीके गुप्ता मरीजों को देख रहे थे। कक्ष 8 में त्वचा रोग विशेषज्ञ सप्ताह में कुछ दिन आते हैं। उनकी अनुपस्थित में मरीजों के देखने वाले डाक्टर साहब दवा लिख रहे थे। तो कक्ष 7 सर्जन की सीट खाली थी। इन सभी डॉक्टरों की कक्षों के बाहर मरीजों की भीड़ लगी थी, कोई दर्द से कराह रहा था तो कोई पचासों किमी दूर बरसात में आया था। हड्डी वार्ड का भी यही हाल था न कोई देखने वाला और न ही कोई प्लास्टर करने वाला था। अस्पताल में मौजूद लोगों ने बताया कि यह एक दिन का नहीं रोजाना का काम है।
इंसेट
यहां पर टूट फूट में होता है सब काम
हरदोई। जिला अस्पताल के एक्स रे और अल्ट्रासाउंड कक्ष में टूट फूट का काम भी होता है। कहने को तो अस्पताल में तमाम इंतजाम हैं, पर दर्द से मरीज तड़पते रहते हैं और डाक्टर को देखने तक की फुर्सत नहीं है। मरीज स्ट्रेचर पर पडे़ रहते हैं और मेडिकोलीगल वालों का पहले एक्स रे होता है।
आकस्मिक कक्ष तक में नहीं बैठते डॉक्टर
हरदोई। जिला अस्पताल में ओपीडी की तो बात ही छोड़ दें, आकस्मिक सेवा कक्ष में भी डॉक्टर मौजूद नहीं रहते हैं। एक दो डॉक्टरों को छोड़ अन्य तो आराम ही फरमाते रहते हैं। बुधवार साढ़े ग्यारह बजे मरीज बाहर पड़े थे, पर डाक्टर का अता पता नहीं था। पूछने पर बताया कि अभी आ रहे होंगे।
बिना चादर, फटे गद्दों पर लेटते रोगी
हरदोई। बरसात के मौसम में एक ओर बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया है तो दूसरी ओर अस्पताल वार्डों में अव्यवस्थाएं भी बढ़ती जा रही हैं। सीलन और बदबू से तो वार्ड में बैठना मुश्किल होता ही है, पलंगों के फटे गद्दे और उन पर चादर तक नहीं डाली जाती है। सभी वार्डों का यही हाल है, पर इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।
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डॉक्टरों के तबादले से कुछ समस्या हुई
‘सीएमएस डॉक्टर प्रेम नारायण का कहना है कि अस्पताल से डॉक्टरों का तबादला होने से कुछ परेशानी आई है। हालांकि वह भी दूर हो जाएगी। बोले, वह राउंड लेते हैं और अगर कोई देर से आता है या सीट खाली मिलती है, तो कार्रवाई करेंगे।’

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