मक्के को ‘तुलसिता’ दे सकता झटका

Hardoi Updated Sun, 22 Jul 2012 12:00 PM IST
हरदोई। पारंपरिक खेती की ओर से किसानों का रुझान कम तो होने लगा है, पर ऐसा भी नहीं है कि इनकी खेती होना ही बंद हो गई है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है वैज्ञानिक पद्धति व जागरूकता से यदि खरीफ में मक्का की खेती की जाए तो यह भी अच्छी उपज देकर किसानों को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान कर सकती है। बशर्ते तुलसिता व झुलसा रोग पर नियंत्रण पूरी तरह से रखें।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि खरीफ के सीजन में रोपाई के समय कुछ महत्वपूर्ण चीजें किसान यदि ध्यान रखें तो अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं। मक्का की खेती के लिए उत्तम जल निकासी वाली बुलई दोमद भूमि उपयुक्त होती है। अच्छी किस्म के बीजों का चुनाव करें। मक्के की बुआई जून माह के अंत से शुरू होकर जुलाई माह तक ही उत्तम रहती है। बीज की मात्रा 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से करें और बीज को बोने से पहले उसको शोधित कर ले। खरपतवारों की रोकथाम के लिए मक्के की बुआई से दूसरे या तीसरे दिन एट्राजीन की निश्चित मात्रा पानी में घोलकर उसका छिड़काव करने से फायदा हो सकता है।
कृ षि वैज्ञानिक डॉक्टर मुकेश ने बताया कि मक्के की अच्छी उपज के लिए जरूरी है कि समय-समय पर फसल का रख रखाव करें और फसल को समय-समय पर जाकर खेत में घुसकर पौधों को देखना चाहिए कि कहीं कोई कीट या रोग तो नहीं लगा है। यदि ऐसा कुछ दिखाई देता है, तो अपने नजदीकी विशेषज्ञ से तो सलाह ले ही सकते हैं। इसकेे अलावा समय-समय पर फसल को नुकसान पहुंचाने वाले तना छेदक, पत्ती लपेटक, कमला कीट, तुलसिता रोग, झुलसा रोग आदि से बचाव के लिए रासायनों का प्रयोग किया जाता रहे, ताकि अच्छी उपज मिल सके।
उन्होंने बताया कि तुलसिता रोग से बचने के लिए जीरम एवं अन्य रोगों से बचने के लिए कापर आक्सी क्लोरीड आदि का प्रयोग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तरीके से चलने पर लाभ मिल सकता है, अन्यथा पारंपरिक खेती वह भी पुराने ढर्रे से सिवाय नुकसान के और कुछ नहीं दे सकती।

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