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अब कहां नाग-नागिन, कहां तांडव

Hardoi Updated Wed, 18 Jul 2012 12:00 PM IST
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हरदोई। नाग की मौत पर नागिन जमकर तांडव करती है। जहां नाग मारा जाता है, उस स्थल पर पहुंचकर नागिन न सिर्फ नाग की आंखों में देखकर मारने वालों की तस्वीर आंखों में उतार लेती है, बल्कि डसकर मौत के घाट उतार देती है। सावन आते ही इन भ्रांतियों को फिर से बल मिल गया है, पर बदला लेने को नहीं बल्कि, नाग के शरीर से छूटी गंध का पीछा कर नागिन पहुंचती है।
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वैज्ञानिक तौर पर नागिन के क्रोध को दूसरे रूप में देखा जाता है। हिंदू धर्म में सावन शिव भक्ति का शुभ काल है। शिव को कालों का काल कहा जाता है। शिव के गले में नाग का हार पहनना और कंठ में विष उतारकर नीलकंठ बनना इसका प्रमाण है कि सर्प काल का ही रूप माना जाता है। यही कारण है कि सावन के शुक्ल पक्ष की पंचमी के पुष्प काल में नाग पंचमी 23 जुलाई पर नागों के देवता रूप में पूजा कर सुख शांति की कामना की जाती है। सांपों से जुड़ी मान्यता है कि सांप अपने साथी की मौत का बदला लेते हैं। यह भी कहा जाता है कि नागिन रास्ता दूर से ही देख लेती है और नाग के पास पहुंच जाती है।

पर, इसके पीछे उनकी सर्प प्रजाति की बनावट, उनकी विशेषताएं होती हैं। विषय विशेषज्ञ नवनीत सिंह राठौर का कहना है कि असल में सांपों की सूंघने की शक्ति काफी तेज होती है। प्राकृतिक रूप से सांप अपने शरीर से एक गंध पदार्थ छोड़ते हैं, जिसे फेरामोन नाम से जाना जाता है। तेज क्षमता व गंध के प्रति संवेदनशील होने से दूर से आ रही इस गंध को सूंघकर वह सांप आ जाता है। बुजुर्गों का कहना है कि सावन सांपों के मिलन व सक्रियता का काल होता है। वहीं मानव भी इसी वक्त खेतीबाड़ी व अन्य कार्यों से सांपों से सामना करते हैं, क्योंकि इन्हीं दिनों वह बारिश में बिलों तक पानी पहुंचने से बाहर निकलते हैं।
जानकारों का कहना है कि इसी तेज गंध द्वारा दूसरा सर्प संबंधित स्थान पर पहुंच सकता है और वहां जाकर या तो मार दिया जाता है या फिर मानव जाति द्वारा प्रहार करने पर मौका देकर वहीं काट लेता है। सर्प के इस व्यवहार को कालांतर से बढ़ा चढ़ाकर कहा जाता रहा है। उधर, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. श्रीकृष्ण का कहना है कि वैज्ञानिक इस भावना को सरीसृप जाति में संभव नहीं मानता, इसलिए मानव जाति को पुरानी भ्रांतियों को भूलकर नए सिरे से सोचना चाहिए। अनावश्यक इनको पकड़ कर हत्याएं न करें, क्याेंकि यह भी मानव जाति से दूर रहने वाला प्राणी है। फिलहाल नागिन के बदले वाली बात विज्ञान नहीं मानता।

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