अब कहां पड़ते सावन के झूले

Hardoi Updated Wed, 18 Jul 2012 12:00 PM IST
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हरदोई। आधुनिकता की आंधी व भागमभाग जिंदगी के बीच सुकून के पल छिनते जा रहे हैं। अब तो अपनी परंपराओं के लिए भी लोगों के पास वक्त नहीं है। उत्सव फीके होने लगे हैं, यदि मनाए जा रहे हैं तो सिर्फ रस्म अदायगी भर को। आधुनिकता की आंधी में सावन के झूलों की रफ्तार मंद दिखाई दे रही है। शहर तो शहर गांव में भी सावन को लेकर कजरी व मल्हार की आवाजें नहीं सुनाई दे रही हैं।
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एक समय वह था, जब गांव तो गांव शहर में भी विवाहिताएं व लड़कियां सावन और उसमें पड़ने वाले झूलों का इंतजार करती थी। बागों मेें झूलों पर सहेलियों के साथ हंसी ठिठोली हुआ करती थी, पर वक्त की करवट के साथ सब बदलता नजर आ रहा है। बुजुर्गों का कहना है कि परंपराओं में ही नवविवाहिताओं को सावन में अपने मायके बुलाया जाता था। मायके में घर की लड़कियां सखियों के साथ हंसी ठिठोली करती थी। सावन में पड़े झूलों को झूलने के साथ ही कजरी, मल्हार की धुने गुनगनाई जाती थी, पर इस बार सब कुछ बदलता नजर आ रहा है।
सावन में शहर में तो छोड़िए गांवों तक में झूलें नजर नहीं ही आ रहे हैं। जिसके बाद अमुआ की डालियां सूनी हैं व मल्हारें खामोश हैं। शहरी क्षेत्रों में कहीं-कहीं सावन को मनाने का प्रयास भी किया जा रहा, तो मल्हारों को किटी पार्टी का रूप दे दिया गया है। शहर की वसुधा, प्रियंका, अर्चना आदि का कहना है कि इस युग में अब लोगों के पास समय की कमी है। सावन में मायके जाने से ज्यादा बच्चों आदि की पढ़ाई ज्यादा जरूरी है। यदि सावन का त्योहार मनाना होता है, तो फिर सहेलियों आदि के साथ पार्टी आदि करके मना ली जाती है।
उधर, समय में बदलाव यदि ऐसे होता रहा, तो आने वाले समय में भावी पीढ़ी यह भले ही जान ले कि सावन कौन सा माह होता है, पर सावन में झूले क्यों डाले जाते हैं, मल्हारें व कजरी क्या होती है। इससे अनभिज्ञ रहेंगे। बुजुर्गों का कहना है कि वक्त की करवट के बाद परंपराओं से लोग दूरी बनाने लगे हैं। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सावन के झूले क्यों डाले जाते है और कजरी क्या होता है। बच्चे जरूर पूछ बैठेंगे।
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