जब सूखा पड़े तो ‘कंठ’ न तरसे

Hardoi Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
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हरदोई। किसी ने सही कहा है कि जब आंधी तूफान आता है तो गिरते हुए पेड़ों की टहनी पर बैठे पक्षियों को डाली का नहीं अपने दो पंखों पर एतबार होता है। उसी तरह जब धरती का साथ छोड़ पाताल सूखता जा रहा है तो लोगों को अब चेतकर जल संचयन पर विश्वास कर ही लेना चाहिए, ताकि जब सूखा पड़े तो एक एक बूंद के लिए कंठ तड़पते न मिले।
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भूगर्भ में पला जल का भंडार अब खत्म सा होने लगा है। प्रकृति विद्रोह पर उतारू है, न तो बारिश ही समय पर होती है और न ही सर्दी। जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। वैज्ञानिक लगातार चेता रहे हैं कि जल का भंडार अब खत्म होने लगा है। इस बाबत वैज्ञानिक मुकेश कुमार का कहना है कि परिणामों व शोधों के बाद अब सबको पता लग गया है कि जो धरती में जल का भंडार था, उसका लगातार प्रयोग होने के बाद वह कम हो गया है। एक समय तक ही इस पानी का उपयोग किया जा सकता है, इसलिए जल को बचाना ही होगा।
यह कार्य सामूहिक रूप से किया जाए तो ज्यादा असरदार होगा। पेयजल संकट के साथ ही पौधे के रूट जोन वाटर में कमी होती जा रही है, जो उपज की मात्रा के साथ ही अनाज के गुण तत्व को बदल रही है। वातावरण की इस क्रिया में शहर की अहम भूमिका होती है। इससे यह है कि एक तो शहर के अधिकांश क्षेत्र कंकरीट के होते हैं, तो इस कारण बरसात का पानी जहां भूमि में नहीं जा पाता तो वहीं दोहन की मात्रा सर्वाधिक होती है।
उधर, विशेषज्ञों की माने तो शहर का कोई भी भाग क्यों न हो उसका एक ढाल होता है। यही प्राकृतिक ढाल उस क्षेत्र के जल को सतही या भूभागीय बनाता है। आवासीय परिसरों, सरकारी भवनों, गलियों, पार्कों आदि के किनारे जहां बारिश का पानी ढलान पर बहता है, वहां से बहाव की दिशा बदल देनी चाहिए। इस बहाव को 8 से 18 मीटर लंबे चार इंच से ज्यादा वाले छिद्रदार पाइप के सहारे जमीन के अंदर पहुंचाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इससे भूगर्भ स्तर कुछ संभलने की संभावनाएं तभी बनती है जब सब मिलकर इस कार्य को करें।
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