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‘अजमत का महीना मोहर्रम’

Hardoi Updated Wed, 05 Nov 2014 05:30 AM IST
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पिहानी (हरदोई)। शोहदा-ए-इस्लाम के नौवें जलसे में इमाम हुसैन की सीरत और शहादत पर प्रकाश डाला गया। मदरसा जामिउल हुदा मुरादाबाद के उस्तादे तफसीर मौलाना जुबैर आलम कासमी ने कहा कि इमाम हुसैन ने जंग-ए-करबला में सब्र और शुक्र का बेहतरीन नमूना पेश किया। अहले बैत की मोहब्बत के बगैर जन्नत का रास्ता नहीं मिलने वाला है।
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मसजिद सैयदना फारूके आजम में सुन्नी धर्मगुरु मौलाना रूहुल्लाह बिहारी की अध्यक्षता में हुए जलसे में मौलाना कासमी ने कहा कि मोहर्रम अजमत का महीना है। दसवीं मोहर्रम को नवासा-ए-रसूल की शहादत के साथ ही कई अन्य अहम इस्लामिक घटनाएं हुई हैं। उन्होंने कहा कि नबी के प्यारे नवासे को दसवीं मोहर्रम के दिन प्यासा शहीद कर दिया गया। तकरीबन चौदह साल पहले शहीद हुए हजरत हुसैन की मोहब्बत आज भी दिलों मेें जिंदा है। इमाम हुसैन ने अपनी शहादत पर सब्र और शुक्र का बेहतरीन नमूना पेश किया था। पैगंबरों के साथ उनकी बीबियां भी पाक साफ हैं। उन पर छींटाकशी जहन्नुम में ले जाने वाली है। हजरत आयशा सिद्दीका जन्नत की रानी और फातिमा जोहरा जन्नत की शहजादी हैं।
उन्होंने अहले बैत से मोहब्बत को जरूरी बताते हुए कहा कि इनकी मोहब्बत के बगैर जन्नत नहीं पाई जा सकती। इसके साथ ही उन्होंने खुलफा-ए-राशिदीन की शान बयान फरमाई। मौलाना ने मुसलमानों को चेताया कि अल्लाह की मदद चाहिए तो शिर्क और बिदअत जैसे बड़े गुनाहों से बचें। इससे पहले मोलाना कमरूद्दीन व जमीयत उलेमा हिंद पिहानी के महासचिव मौलाना सबीहुल हसन कासमी ने कहा कि अल्लाह और रसूल का बताया रास्ता हमें सहाबा के जरिए ही मिला है। हमें चाहिए कि इस्लामी तालीमात पर अमलपैरा हों। मोहम्मद ने जिन बातों से मना फरमाया उनसे बचना जरूरी है। रसूल के एहकाम की खिलाफवर्जी कर हम सुकून नहीं पा सकते। सुकून चाहिए तो मोहम्मद रसूलल्लाह के गुलाम बन कर जिएं।
कहा कि आपकी बताई बातों पर अमलपैरा होकर ही दुनिया और आखिरत को संवारा जा सकता है। जलसे की शुरूआत हाफिज महमूद अहमद ने तिलावते कुरान से की। साकिब व गुलजार आदि ने नातो मनकबत के शेर सुनाए। संचालन मौलाना उमर कासमी ने किया। उधर, सुन्नियों ने यौमे आशूरा (दसवीं मोहर्रम) पर रोजा रखकर दुआएं मांगी। यौमे आशूरा का दिन तारीखे इस्लाम में काफी अहम माना गया है। इस दिन एक दिन पहले या एक दिन बाद को जोड़ कर दो रोजे रखने की बड़ी फजीलत है। यौमे आशूरा के साथ ही सुन्नियों ने नौंवीं या ग्यारहवीं मोहर्रम दो दिनों का रोजा रखकर दुआएं मांगीं।
इंसेट---
सच्चाई का पैगाम है शहादते हुसैन : रजी
संडीला। शहादते इमाम हुसैन वह शहादत है, जिसका एहसान उम्मते मुसलमा पर है, क्योंकि इस्लाम को बचाने को हजरत इमाम हुसैन अपने घर वालों के साथ करबला के मैदान में शहीद हुए थे। इमाम हुसैन व उनके घर वालों का उम्मते मुसलमा पर यह कभी भी नही भुलाया जा सकता। यह बात मौलाना रजी अलवी ने दरगाह मीरा साहब में दस मोहर्रम की मजलिस में कही। कहा कि जुल्म की मुखालिफत व सच्चाई का पैगाम है शहादते हुसैन। छोटा चौराहा स्थित मदरसा गौसिया पर हुई मजलिस में मौलाना मेंहदी हसन ने कहा कि अज्र रिसालत की बुनियाद मोहब्बत अहले बैंत है। तहरीक परचमें मोहम्मदी के अध्यक्ष फरीदउद्दीन ने कहा कि हुसैन की शहादत पूरी दुनिया के लिए हुज्जत बन गई है। इस मौके पर अंजुमन सिब्तेनियां, अंजुमन रिजविया, अंजुमन फातिमी, अंजुमन जेहरा की ओर से मजलिस, मातम, नौहाख्वानी का दौर जारी रहा।
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उठा 200 साल पुराना ताजिया
संडीला/कछौना। कल्लू चौधरी का 200 साल पुराना ताजिया दरगाह हजरत अब्बास से उठा, जिसमें ताजिया कमेटी के पदाधिकारी डा. इंतिसार हुसैन व शाहिद अली शामिल हुए। इमाम बारगाह आशिक अली, खुली खिड़कियां मंडई से कमर इस्तियाक व डा. इंतिसार हुसैन के यहां संपन्न मजलिस के बाद दसवीं मोहर्रम का फाका किस्मी का अलम का जुलूस शिया मसजिद मंडई से निकाले गए, जिसमें आज हमारा हुसैन हमसे जुदा हो गया कि सदाएं गूंजती रही। जुलूस के समापन पर मजलिस, आग पर मातम हुआ। इधर, माधौगंज में प्रमुख मार्गों से ताजियों का जुलूस निकला और पंचपीर क र्बला पहुंचा, जहां ताजिये दफनाए गए। इधर, कछौना में मुसलिम समाज के लोगों ने जुलूस में सीनाजनी कर मातम किया।
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