‘काफी मुसलमान गुमराही का शिकार’

Hardoi Updated Sat, 23 Nov 2013 05:42 AM IST
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पिहानी (हरदोई)। पूरी दुनिया मेें शांति की दुआ के साथ सुन्नियों के सोलह दिवसीय शोहदा-ए-इसलाम जलसों का समापन हो गया। इजलास के अंतिम दिन दुआ में शामिल होने को भारी संख्या में महिला-पुरुषों ने भागीदारी की। इस मौके पर जलसों के संस्थापक मस्जिद फारुके आजम के इमाम मौलाना रूहुल्लाह बिहारी ने जब रो रोकर दुआ शुरू करवाई, तो मजलिस में सन्नाटा फैल गया।
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अंतिम जलसे की शुरुआत तिलावते कुरान के साथ र्हुई। तकरीर करते हुए जलसों के संस्थापक सुन्नी धर्मगुरु मौलाना रूहुल्लाह बिहारी ने कहा कि जलसों का मकसद मुसलिमों के बिगड़े अकीदों में सुधार करना है। उन्होंने कहा कि किसी के मजहब पर कीचड़ उछालना इसलाम नहीं सिखाता। ऐसा शख्स मोमिन नहीं हो सकता जो सहाबा पर कीचड़ उछाले। जलसों का मकसद सहाबा और रसूल की तालीमात को सही पेश करना है। कहा कि अकीदे की सुधार के लिए जलसों की नींव डाली गई थी और आज अल्लाह का शुक्र है कि काफी आबादी को इससे फायदा भी पहुंचा है। कितने ही घरों से दीन के नाम पर जारी गैर इसलामी रस्में खत्म हो गईं। कहा कि बिना अकीदे में सुधार के जन्नत हासिल नहीं हो सकती।
कहा कि काफी मुसलमान गुमराही का शिकार हैं। हम सब की जिम्मेदारी है कि कौम के सुधार हेतु चिंतित हों। मुरादाबाद से आए मौलाना सालिम कासमी ने कहा कि रसूल हम सब की हिदायत के लिए आए थे। रसूल से पहले दुनिया के अजीब हालात थे। कुरान का हवाला देकर मौलाना ने कहा कि अल्लाह ने सहाबा-ए-कराम से अपनी रजा का ऐलान किया, साथ ही सहाबा के लिए भी कहा कि वह अल्लाह से राजी हैं। अंतिम दिन सुन्नी धर्मगुरु मौलाना बिहारी ने रो रोकर अल्लाह से पूरी दुनिया में अमन कायम कर देने की दुआएं मांगी। दुआ के दौरान मजलिस में सन्नाटा फैल गया। इस मौके पर हकीमुद्दीन हैरत, फहीमुद्दीन, कादिर खां व अली आदि ने नातो मनकबत पढ़ी। संचालन मौलाना उमर कासमी ने किया।
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हुसैन का गम, दहकते अंगारों पर मातम
पिहानी (हरदोई)। सोलहवीं मोहर्रम पर शियाओं ने खुर्मुली में अलम का जुलूस उठाया और नौहे पढ़ते हुए आग पर मातम कर गम-ए-हुसैन मनाया। इस दौरान युवकों ने आग में तपी छुरी का मातम किया और दहकते हुए अंगारों पर नमाज अदा की। मसजिद मिसबाहे हुसैनी से अंजुमन हुसैनिया ने अलम का जुलूस निकाला। यहां से परंपरागत रास्ते तय करता हुआ जुलूस खुर्मुली में कार्यक्रम स्थल तक पहुंचा। देर रात तक स्थानीय व आसपास की अंजुमनों ने जुलूस बरामद करते हुए नौहाख्वानी और मातम किया। दहकाई आग पर चलते हुए शिया नौजवानों शुभम, अब्बास, सरताज़, दीपक, अब्बास व मोहम्मद आदि ने मातम किया। दहकते हुए लाल अंगारों पर तालिब व इमरान आदि युवकों ने नमाज अदा कर नवासा-ए-रसूल से अकीदत का इजहार किया। मास्टर अजादार हुसैन के आवास पर बरपा मजलिसे अज़ा में मौलाना अब्बास ने कहा कि इमाम के 72 साथी वफा और बहादुरी का बेमिसाल नमूना हैं। उन्होंने कहा कि मौत यकीनी थी, पर सभी मौत से न घबराए। इमाम के साथी कदम से कदम मिलाकर चलते रहे। शहदाते हुसैन का जिक्र सुनकर मौजूद अजादारों की पलके नम हो गईं।
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