खाद्यान्न बेचकर बच्चों को करा रहे भोजन

Hardoi Updated Wed, 10 Oct 2012 12:00 PM IST
हरदोई। परिषदीय विद्यालयों में बच्चों के निवालों पर संकट है। जिम्मेदारों की लापरवाही से मिड डे मील को लेकर पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों परेशान हैं। विद्यालयों में खाना बनाने के लिए समय से धनराशि नहीं दी जाती। खाद्यान्न तो भेज दिया जाता लेकिन धनराशि न भेजने से कुछ टीचर खुद खाना बनवा रहे हैं। कुछ विद्यालय ऐसे भी हैं जहां पर खाद्यान्न बेचकर तेल मसाला मंगवाकर मिड डे मील बनवाया जा रहा है। हालांकि विभाग का कहना है कि खाद्यान्न भेजा जा चुका है। शीघ्र ही धनराशि भी भेज दी जाएगी।
जिले के 2833 प्राथमिक विद्यालयों में 204944 छात्र व 207463 छात्राएं और 1025 उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 65992 छात्र और 73846 छात्राएं पढ़ाई करती हैं। इसी तरह 44 सहायता प्राप्त विद्यालयों में भी करीब 12 हजार बच्चे पढ़ाई करते हैं। बच्चों को मिड डे मील देने के लिए प्राथमिक विद्यालयों में प्रति बच्चा 3.11 रुपए कनवर्जन कास्ट और 100 ग्राम खाद्यान भेजा जाता है। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 4.65 रुपए व 150 ग्राम खाद्यान्न दिया जाता है।
बच्चों को मिड डे मील देने के लिए आदेश तो दिए जाते हैं लेकिन जिम्मेदारों की लापरवाही से न तो बच्चों को सही खाना मिल पाता और शिक्षकों को भी परेशानी उठानी पड़ती है। विद्यालयों में समय से न तो कनवर्जन कास्ट भेजी जाती है और न ही खाद्यान्न। खाना बनें तो कैसे। जिले में खाद्यान्न और कनवर्जन कास्ट को देंखे तो जुलाई माह में सितंबर तक के लिए खाद्यान्न भेज दिया गया था जिसमें 1631.49 एमटी चावल और 827.64 एमटी गेहूं भेजा गया था लेकिन खाना बनाने के लिए कनवर्जन कास्ट नहीं भेजी गई। अप्रैल से मई तक प्राथमिक विद्यालयों में दो करोड़ 52 लाख 77 हजार रुपए व जूनियर विद्यालयों में एक करोड़ 42 लाख 23 हजार रुपए कनवर्जन कास्ट भेजी गई थी। सितंबर तक खाद्यान्न तो था लेकिन इसे बनाने के लिए धनराशि केवल अप्रैल महीनों तक ही थी। गत शैक्षिक सत्र मई और उसके बाद जुलाई, अगस्त और सितंबर की धनराशि नहीं भेजी गई। धनराशि न होने से बहुत से विद्यालयों में मिड डे मील बनना ही बंद कर दिया गया तो ज्यादातर विद्यालयों में टीचर अपनी जेब से ही खाना बनवा रहे हैं। बहुत से विद्यालयों में खाद्यान्न बेच कर खाना बनवाया जा रहा है। कक्षा एक से आठ तक परिषदीय और सहायता प्राप्त विद्यालयों में करीब सवा छह लाख बच्चों के खाने पर संकट के बादल हैं।

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