अब 843 किसानों को बनाया 9.29 करोड़ का कर्जदार

Hapur Updated Sun, 12 Aug 2012 12:00 PM IST
घोटाले में अधिशासी अभियन्ता और लिपिक समेत तीन के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

हापुड़। पावर कारपोरेशन में एक और घपले का खुलासा हुआ है, जिसमें वर्ष 2006 में 843 नलकूप उपभोक्ता किसानों को 9.29 करोड़ रुपये की छूट का लाभ देकर उनकी बकाया राशि शून्य कर दी गई थी। फंसने का नंबर आया तो एक अधिकारी ने छूट समाप्त कर किसानों के खाते में फिर से बकाया दर्ज करा दी, इससे किसान फिर कर्जदार बन गए। कारपोरेशन के हापुड़ कार्यालय में 225 करोड़ के घोटाले की जांच में यह उजागर हुआ है। घोटाले में एक अधिशासी अभियन्ता और एक लिपिक समेत तीन लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है।
तत्कालीन अधिशासी अभियन्ता सत्यवीर सिंह राठौर ने 27 दिसंबर 2007 को अधीक्षण अभियन्ता को लिखे पत्र में स्वीकारा है कि प्रबंध निदेशक के निर्देश का पालन करते हुए वर्ष 9/06 से 12/06 तक एक मुश्त समाधान योजना के तहत कुल 843 निजी नलकूप उपभोक्ता किसानों को लाभ देने के लिए करीब 9.29 करोड़ रुपये ब्याज एवं काल्पनिक धनराशि चिन्हित कर समाप्त करने के लिए खातों में दर्ज करा दिया। लेकिन, 12 माह बीतने पर एमडी कार्यालय से बकाया के अनुमोदन के लिए कोई टीम न आने पर धनराशि को माह 05/07,06 07,07/07 में नलकूप उपभोक्ता किसानों के खातों में दर्ज कर दिया। किसानोें के साथ हुई इस धोखाधड़ी की उन्हें भनक तक नहीं लगने दी।
बिजली विभाग में हुए 225 करोड़ के घपले को लेकर विभाग के बर्खास्त लिपिक के के अग्रवाल की शिकायत पर हाईकोर्ट के आदेश पर चल रही जांच के दौरान पहली चार्जशीट दाखिल करने वाले कोतवाली के उप निरीक्षक स्वतंत्र कुमार सिंह ने लिखा है कि वर्ष 2006 में तत्कालीन अधिशासी अभियन्ता सत्यवीर सिंह राठौर के कार्यकाल में 9.29 करोड़ की गैरकानूनी छूट केवल माह दिसंबर 2006 में फर्जी तरीके से निजी नलकूप उपभोक्ताओं की क्षति जान बूझकर करोड़ों रुपये के अनुचित लाभ के बहाने पहुंचाई गई।
बाद में अधिशासी अभियन्ता ने अपनी संलिप्ता सिद्ध होने के डर से फिर से छूट की राशि 9.29 लाख रुपये उपभोक्ताओं के खातों में चढ़वा दी। छूट का लाभ किसी भी उपभोक्ता को तभी मिल सकता है, जब वह इसके लिए पहले एक हजार रुपये जमा कर अपना रजिस्ट्रेशन करा ले लेकिन ऐसा भी नहीं कराया था। इससे विभाग को लगभग 8.43 लाख रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ था। उधर, 843 उपभोक्ताओं पर कभी भी वसूली की गाज गिर सकती है। अधिशासी अभियन्ता ने उपभोक्ताओं पर बकाया को काल्पनिक बताकर यह कार्यवाही की थी, ताकि खाते सही हो जाएं। उन्होंने विभाग में करीब 25 करोड़ का घपला होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन उल्टे वही इस मामले में फंस गए।

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