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बीमार बेटे को जंगल में फेंक गए

Hapur Updated Tue, 17 Jul 2012 12:00 PM IST
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मौत नहीं...बेचारे सत्या को जिंदगी चाहिए
बदनसीब युवक ने की सुसाइड की कोशिश, बचाया
वर्दीवालों ने भी छोड़ा साथ मौत से लड़ रहा बेचारा

गढ़मुक्तेश्वर। रिश्ते मरते दम तक साथ निभाने को होते हैं मगर इस बदनसीब के साथ ऐसा नहीं है। चर्म रोग से पीड़ित यह नौजवान उन घरवालों के लिए भी बेगाना हो गया, जिनके लिए उसने बचपन से खून-पसीना बहाया था। अपनों ने न सिर्फ उससे मुंह फेरा, बल्कि से मौत से लड़ते बेटे को ब्रजघाट पर फेंककर चले गए। परेशान सत्या उफनती गंगा में कूदकर जान देना चाह रहा था मगर पुलिस ने ऐसा नहीं होने दिया। पुलिस चाहती तो उसे अस्पताल भिजवा सकती थी मगर वर्दीवालों को भी उस पर दया नहीं आई और उसे उसके हाल पर छोड़कर चली गई। अब वो गंगा किनारे तड़प रहा है और कोई उसकी सुध लेने वाला नहीं।
ब्रजघाट में गंगा की सीढ़ियों पर पड़े तड़प रहे इस नौजवान का नाम सत्यपाल उर्फ सत्या है। उम्र यही कोई 35 साल। बताया गया है कि रविवार शाम कोई उसे पीठ पर लादकर लाया था और गंगा किनारे पटक गया। सत्या चीखता ही रह गया। गंगा स्नान को आ जा रहे लोगों ने पूछा तो उसने अपनी करुण कथा कुछ इस तरह सुनाई।
सत्या ने बताया कि वह जेपीनगर के गांव मनौटा का रहने वाला है। एक साल पहले कुष्ठ रोग लगा था। समय पर इलाज न होने से उसकी हालत खरात होती चली गई। इलाज कराने की बजाय घरवाले गंगा मैय्या की गोद में फेंक गए। चश्मदीदों के मुताबिक, सोमवार सुबह सतपाल ने गंगा पुल से कूदकर जान देने की कोशिश की लेकिन वहां गश्त कर रहे एक पुलिस अधिकारी ने उसे देख लिया और पुलिसकर्मियों को भेजकर उसे पुल से हटवा दिया। सत्या ने पुलिस को भी आपबीती सुनाई मगर अस्पताल पहुंचाने की जगह पुलिसवाले उसे वहीं छोड़कर चले गए। सत्या गंगा किनारे पड़ा अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है मगर कोई उसकी मदद करने वाला नहीं।



डाॅक्टरों की सुनिए
गढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र अधीक्षक डॉ. संतोष कुमार का कहना है कि पुलिस मरीज को हमारे पास लेकर आए तो उसका इलाज करेंगे। बीमारी गंभीर हुई तो मेरठ मेडिकल कालेज भेजकर परीक्षण कराएंगे। सिंभावली प्रभारी डॉ. संजीव कुमार का कहना है कि कुष्ठ रोग असाध्य बिल्कुल भी नहीं है मगर इसका इलाज जरूरी है।



कमाऊ बेटे का ऐसा हाल
सत्या बताता है कि वह पहले प्राइवेट बस में कंडक्टर था। बाद में जोया बस अड्डे पर बसों की टिकट भी काटता था। मुफलिसी के मारे घरवालों को सहारा देने के लिए पढ़ने की उम्र से ही मजदूरी करने लगा था। अब बीमार है तो कोई उसे देखने वाला नहीं। घाट की सफाई करने वाले तो उसे रिक्शे में दूर कहीं फेंक आने को कह रहे थे मगर लोगों ने ऐसा नहीं होने दिया।

कहानी आस्था नगरी की
गढ़ आस्था की नगरी है। यहां रोज बड़ी संख्या में दूर-दूर से गंगा भक्त आते हैं। धर्म-कर्म करते हैं और चले जाते हैं। मौत से जूझते एक नौजवान की मदद करने को फिर भी कोई आगे नहीं आ रहा। रविवार रात दर्द से तड़पते सत्या को ब्रजघाट के नरेश शर्मा ने दवा लाकर जरूर दी।

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