सदियों पुरानी द्वंद कला के प्रति युवाओं का मोहभंग

Hamirpur Updated Sat, 29 Dec 2012 05:30 AM IST
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कसबे के दोनों प्राचीन अखाड़े वीरान
सरीला (हमीरपुर)। पाश्चात्य संस्कृति की तेजी से बढ़ती चकाचौंध और महंगाई ने पहलवानी का जज्बा रखने वालाें की कमर तोड़ दी है। सदियों पुरानी इस द्वंद कला के प्रति युवाओं का पूरी तरह से मोहभंग हो चुका है। इसी के चलते नगर के दोनों प्राचीन अखाड़े वीरान पड़े हैं।
किसी समय में पहलवानी को द्वंद कला के रूप में जाना जाता था। सदियों पहले इसी कला के माध्यम से योद्धा अपनी ताकत का प्रदर्शन कर जीत-हार किया करते थे। लेकिन मौजूदा समय में द्वंद कला से लोगों का मोह भंग हो गया है और लोग इसे भूलने लगे है। पहले लोग तड़के जागकर अखाड़ों में घंटों पसीना बहाकर शरीर को सुडौल बनाने के साथ कुश्ती के दांवपेेंच सीखते थे। लेकिन अब यह कार्य गुजरे जमाने की बात हो गई है। किसी जमाने में नगर के बजरंग अखाड़ा व कालका देवी अखाड़े में पहलवान समाते नहीं थे। लेकिन आज यहां कोई दिखाई नही देता। अखाड़ों की शक्ल और सूरत बदल गई है। नगर के बुजुर्ग पहलवान राजाराम सोनी बताते है कि स्व.राजा नरेंद्र सिंह के मंझले भाई उपेंद्र सिंह को इस कला से विशेष प्रेम था। बताया कि करीब 40 वर्ष पूर्व नगर के स्व.पहलवान जगत सिंह ने गोहांड के दंगल में मथुरा केसरी पहलवान वीरनारायण को पटकनी दी तो राजा उपेेंद्र सिंह ने उनके खाने पीने का इंतजाम खुद संभाल लिया। कहा जाता है कि घी व सूखे मेवे की कई वर्षों तक व्यवस्था रखी गई तथा उनकी भैंसों के चरने के लिए फ्री में जगह दी। इसी तरह पहलवान करन यादव का कहना है कि युवा वर्ग में इस कला के प्रति मोह भंग चुका है। आज का युवा तो शरीर को बलिष्ट दिखाने के लिए जिम का सराहा ले रहा है। जबकि पहलवानी की कला अंदरूनी ताकत की बदौलत होती है, दिखावे की नहीं। इस कला में सबसे ज्यादा असर पहलवानों को पर्याप्त मात्रा में घी दूध न मिलना भी है। पहलवान हरनाथ सिंह बताते है कि महंगाई इतनी बढ़ गई है कि घी दूध का सेवन हर एक के बस की बात नहीं रह गई है, पहलवानी कौन करेगा। कहा कि अब तो यह कला धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। युवा वर्ग नशा व अनैतिकता की तरफ बढ़ रहा है। इस कला में ब्रह्मचर्य और खानपान का विशेष महत्व होता है। नगर के दोनों अखाड़े आज वीरान पड़े हुए है।

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