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‘मरीज बिकते रहे’, जिम्मेदार बेपरवाह

Gorakhpur Bureauगोरखपुर ब्यूरो Updated Fri, 23 Aug 2019 02:03 AM IST
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‘मरीज बिकते रहे’, जिम्मेदार बेपरवाह
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गोरखपुर (रोहित सिंह)। निजी एंबुलेंस संचालकों की मनमानी की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के किसी भी अधिकारी की तरफ से इनके खिलाफ संबंधित विभागों या पुलिस से शिकायत करने की एक भी घटना सामने नहीं आई। जिला अस्पताल से लेकर मेडिकल कॉलेज के आसपास जहां सीएमओ, डिप्टी सीएमओ, एडी हेल्थ जैसे अधिकारी और उनके ऑफिस हों, ऐसे में उनकी नजर अवैध एंबुलेंस वालों पर न पड़े, समझ से परे है। अमर उजाला ने जिम्मेदार अधिकारियों से बृहस्पतिवार को सवाल किया तो उनके जवाब का लब्बोलुआब अगर-मगर ही रहा। अब उनसे कौन पूछे कि ‘खरीद-फरोख्त’ के इस नापाक धंधे के चलते मरीज का स्वास्थ्य प्रभावित होता है या उनकी जान पर बन आती है तो कौन जिम्मेदार होगा?
सरकारी चिकित्सा व्यवस्था के लचर हाल का फायदा उठा कई निजी एंबुलेंस संचालक मरीज के तीमारदारों को ठग रहे हैं। कुछ निजी अस्पतालों के संचालक व निजी एंबुलेंस चालक जिला अस्पताल और जिला महिला अस्पताल के बाहर सक्रिय रहते हैं। दूरदराज से आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों को बरगलाकर निजी अस्पताल या नर्सिंग होम तक पहुंचा देते हैं। मेेडिकल कॉलेज के प्राचार्य ने बुधवार को ऐसे ही एक एंबुलेस संचालक को परिसर में पकड़कर पुलिस के हवाले किया था, जो 108 एंबुलेंसकर्मी की मिलीभगत से मरीज को अपनी एंबुलेंस में शिफ्ट कर रहा था।
सूत्रों की मानें तो इस खेल में जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और सरकारी एंबुलेंस सेवाओं के कुछ कर्मचारी भी शामिल हैं, जो कमीशन के चक्कर में मौका देख मरीजों को इन एंबुलेंस संचालकों के हवाले कर देते हैं। सरकारी कमजोरी का फायदा उठाते हुए इन निजी एंबुलेंस संचालकों ने अपना पक्का-व्यवस्थित नेटवर्क बना लिया है। कई बार ये उपयोगी भी साबित होती हैं, मगर कुछ एंबुलेंस संचालकों ने मरीज बेचने का धंधा बना लिया है। जिनके पीठ पर येन केन प्रकारेण कमाई करने वाले कुछ नर्सिंग होम संचालकों का मजबूत हाथ है। मेडिकल कॉलेज से पकड़े गए एंबुलेंस संचालक के प्रकरण की जांच ठीक से हुई तो यह नापाक गठजोड़ उजागर भी हो सकता है।
सीएमओ श्रीकांत तिवारी का कहना है कि मरीज को बरगला कर निजी एंबुलेंस से ले जाना गलत है। अगर ऐसा है तो जिले की पुलिस से शिकायत भी की जाएगी। निजी एंबुलेंस या सरकारी एंबुलेंस पर स्वास्थ्य विभाग सीधे कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। सरकारी एंबुलेंस की निगरानी के लिए हर जिले में हैदराबाद की कार्रदाई संस्था जीवीके के मैनेजर की तैनाती की गई है। शिकायत करने पर कार्रवाई उनकी तरफ से की जाती है। मेडिकल कॉलेज वाले मामले में भी सरकारी एंबुलेंस के चालक पर देवरिया के जीवीके मैनेजर की तरफ से कार्रवाई की जाएगी। अगर मरीज के तीमारदार निजी एंबुलेंस से मरीज को ले जाते हैं तो ले जा सकते हैं। सरकारी एंबुलेंस को 15 मिनट में अस्पताल में पहुंचने के लिए प्रयास किया जा रहा है। अभी 25 मिनट तक लग जाते हैं।
मरीजों का कर देते हैं ब्रेनवाश
जिले में त्वरित सेवाओं के लिए 108 नंबर की 30 एंबुलेंस सेवा देने के लिए हैं। जबकि महिलाओं के लिए 102 नंबर की 50 और एएलएस की दो एंबुलेंस चलाई जा रही हैं। 19 ब्लॉक क्षेत्रों के लिहाज से जिले में कुल 82 एंबुलेंस मौजूद हैं। इनकी सेवाएं निशुल्क हैं। इसके बाद भी सरकारी एंबुलेंस के चालक और निजी एंबुलेंस के संचालक के झांसे में लोग ठगी का शिकार हो जाते हैं। सूत्रों की मानें तो जिला अस्पताल में काम करने वाले प्राइवेटकर्मी और इन एंबुलेंस संचालकों के बीच गठजोड़ है, जो मरीज के साथ आए तीमारदार का ब्रेनवाश कर अच्छे इलाज का झांसा देकर निजी अस्पताल भेज देते हैं। इसकी खबर स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों को भी है, लेकिन पता नहीं कार्रवाई करने से क्यों कतराते हैं।
निचोड़ लिया बीस हजार रुपये
गोरखनाथ इलाके के संतोष को तीन दिन पहले परिजन पेट दर्द की शिकायत पर इमरजेंसी ले गए थे। हॉल के अंदर ही जब थोड़ी देर तक कोई डॉक्टर नहीं आया, इसी बीच एक बिचौलिये ने अच्छे इलाज के लिए निजी अस्पताल की जानकारी देकर प्राइवेट एंबुलेंस से भेजने की बात कही। मरीज के कहा कि यहां आए दिन मारपीट की घटना होती है, इसलिए डॉक्टर मरीजों का कायदे से इलाज नहीं करते। निजी अस्पताल में कम कीमत में अच्छा इलाज मिल जाएगा। उसकी बात मानकर एंबुलेंस से निजी अस्पताल आ गए। पांच हजार एंबुलेंस वाले ने लिया, जबकि एक दिन में ही इलाज पर पंद्रह हजार रुपये खर्च हो गए।
मेडिकल कॉलेज में एईएस के मरीजों में करते हैं खेल
इंसेफेलाइटिस के मामलों में मेडिकल कॉलेज एक बार अपनी किरकिरी करवाने के बाद अब फूंक फूंक कर कदम रख रहा है। सूत्रों की मानें तो मेडिकल कॉलेज में जेई (जापानी इंसेफेलाइटिस), एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) के मरीजों को भर्ती नहीं की जा रही। यहां एईएस के मरीजों को अब एक्यूट फेबराइल इलनेस रोग बताकर भर्ती किया जाता है। इसमें बच्चे के सिर में सूजन की रिपोर्ट नहीं होती है। ऐसे में हालत बिगड़ने पर डॉक्टर सीधे पीजीआई रेफर करते हैं। जैसे ही मरीज बच्चों को लेकर वार्ड से बाहर आते हैं, वैसे ही निजी एंबुलेंस चालक व बिचौलिए उन्हें पकड़ लेते हैं। सीधे लेकर निजी अस्पताल पहुंचते हैं।
पैथोलॉजी वाले भी हैं शामिल
शहर के कई रजिस्टर्ड और बिना रजिस्टर्ड पैथोलॉजी सेंटर वाले भी इस खेल में शामिल हैं। घोष कंपनी, बेतियाहाता, दाउदपुर, रुस्तमपुर, मेडिकल रोड समेत शहर के अन्य कई इलाकों में पैथोलॉजी वाले भी सरकारी अस्पतालों से मरीज निजी अस्पतालों में पहुंचाते हैं। इनका भी कमीशन फिक्स होता है। साथ ही उस कमीशन से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को भी हिस्सा जाता है। इसके एवज में विभाग के लोग ऐसे एंबुलेंस संचालकों के खिलाफ शिकायत नहीं करते।
एंबुलेंस सीज करने के विरोध में हड़ताल
मेडिकल कॉलेज। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के ट्रामा सेंटर में बुधवार को मरीज शिफ्ट करने के दौरान पकड़ी गई एंबुलेंस को सीज करने के विरोध में बृहस्पतिवार को निजी एंबुलेंस मालिक हड़ताल पर चले गए। ऐसे में मेडिकल कॉलेज में मरीजों के घर वालों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा। हालांकि सरकारी एंबुलेंस की मदद से मरीज व उनके तीमारदार संबंधित स्थल तक पहुंच सके।
एंबुलेंस चालक को निजी मुचलके पर छोड़ा, एफआईआर नहीं
मेडिकल कॉलेज से पकड़ी गई एंबुलेंस के चालक को गुलरिहा पुलिस ने निजी मुचलके पर छोड़ दिया है। एंबुलेंस सीज कर दी गई है। इस मामले में मुकदमा नहीं दर्ज हुआ है। गुलरिहा पुलिस का कहना है कि इस संबंध में किसी ने तहरीर नहीं दी है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य ने निजी एंबुलेंस और उसके चालक को पकड़कर मेडिकल कॉलेज चौकी के हवाले किया था। साथ ही सरकारी एंबुलेंस के चालकों के पहचान पत्र भी पुलिस को दिए गए थे। इन चालकों के खिलाफ भी पुलिस ने किसी तरह की कार्रवाई नहीं की है। पूरा मामला स्वास्थ्य विभाग या फिर मेडिकल कॉलेज प्रशासन के भरोसे छोड़ दिया गया है।
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