गोरखपुर में भी गूंजी थी मन्ना डे की आवाज

Gorakhpur Updated Fri, 25 Oct 2013 05:39 AM IST
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गोरखपुर। गायिकी में अलग तरह की आवाज, आवाज के साथ-साथ दिनोंदिन ऊंचा होता व्यक्तित्व मगर फिर भी सादगी भरा अंदाज-यही थी मन्ना डे की खूबी। दूर रह कर मन्ना डे की आवाज के जादू को दिलों की गहराई में उतारने वाले गोरखपुर के लोगों को भी उनकी सादगी की गहराई जानने का एक मौका मिला। वर्ष 1988 में अपने प्रशंसकों के बुलावे को न केवल उन्होंने कुबूल किया बल्कि कविता कृष्णामूर्ति, टुनटुन और दिनेश हिंगू के साथ यहां पहुंचे। रेलवे स्टेडियम में चार घंटे के बीच उन्होंने 19 गीत सुनाए तो नवंबर की सर्द रात पर फनकारी की गुनगुनाहट भारी पड़ गई। इस दौरान उनको सुनने और करीब से देखने वालों को जितना उनकी आवाज ने लुभाया उतना ही उनकी सादगी ने।
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ईको प्रभाव पैदा करने वाले उपकरण हटवाए
मन्ना दा के कार्यक्रम के लिये श्याम साउंड की ओर से मुझे स्पीकर और माइक लगाने का मौका मिला था। तब मेरी उम्र करीब बीस साल थी। आवाज में ईको (गूंज) का प्रभाव देने के लिए खास उपकरण लगाया था। मन्ना दा की नजर जब उस पर पड़ी तो उन्होंने फौरन हटाने को कहा। प्यार भरे लहजे में बोले- ‘मुझे अपनी आवाज पर यकीन रहता है न कि किसी यंत्र पर।’ उनके इस फैसले के बाद कविता कृष्णामूर्ति ने भी बिना ईको प्रभाव वाले साउंड सिस्टम पर ही गीत पेश किए।
रामप्रगट पांडेय
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दिल को छू गई मन्ना दा की सादगी
संगीत के जटिल से जटिल सुरों को मन्ना दा जिस सहजता से श्रोताओं को परोसते थे, उसका राज उनकी जीवन शैली में छुपा था। मुझे याद है वह दिन जब मेरे आग्रह को स्वीकार करके वह आकाशवाणी आए। साक्षात्कार की रिकार्डिंग के लिए जब मैं उन्हें लेकर स्टूडियो में जाने लगा तो उन्होंने खैरमकदम के लिए अन्य लोगों को बाहर आने से रोक दिया। यही नहीं प्रवेश के वक्त विजिटर रजिस्टर को खुद मांगकर खुद अपनी राय लिखा। कहा-जिसका जो काम है, उसे ही करना चाहिए। सादगी भरा उनका यह अंदाज सभी के दिलों को छू गया।
सर्वेश दुबे, उद्घोषक, आकाशवाणी, गोरखपुर
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सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थे डे साहब
नाराजगी शब्द तो जैसे डे साहब की डिक्शनरी में ही नहीं था। मुझे याद है कि जब वह गोरखपुर एयरपोर्ट पर उतरे तो उन्हें मैंने खुली जीप में इसलिए बैठाया कि शहर के लोगों को पता चल सके कि महान शख्सियत हमारे शहर में है। यात्रा की थकान, उस पर रात का चार घंटे का कार्यक्रम लेकिन उनके चेहरे पर न तो स्टारडम का गुरूर था न ही कोई नखरा। उस ऊंचाई पर इतनी सहनशीलता वास्तव में संदेश देने वाली थी।
राजेश खुल्लर, एडवोकेट
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