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नहीं मिले शिक्षक तो नए सत्र में बढ़ेगा संकट

Gorakhpur Updated Wed, 27 Mar 2013 05:30 AM IST
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गोरखपुर। वर्तमान शैक्षणिक सत्र तो जैसे तैसे निकल गया पर आने वाले सत्र में यूनिवर्सिटीज में अध्यापन और मुश्किल हो जाएगा। कारण शिक्षकों की कमी। लेकिन राज्य सरकार का ध्यान इस ओर तनिक भी नहीं है। शिक्षकों ने इस मुद्दे पर आंदोलन भी किया पर अंतत: विद्यार्थी हित में उन्हें परीक्षा ड्यूटी से जुड़ना पड़ा। उन्हें प्रमुख सचिव शिक्षा से सिर्फ आश्वासन ही मिला कि नियुक्ति और प्रोन्नति संबंधी नियमावली में संशोधन की प्रक्रिया अंतिम दौर में जल्द ही निर्णय हो जाएगा। लेकिन कुछ होता दिख नहीं रहा है।
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा सर्विस रूल में संशोधन के बाद राज्यों में चयन समिति के प्रारूप में संशोधन होना था, लेक्चरर और रीडर के पदनाम बदले जाने थे, इसके लिए राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 में संशोधन किया जाना था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यूजीसी ने जो नए नार्म राज्य सरकार को भेजे तो सरकार ने उसे विश्वविद्यालयों को भेज कर नई नियमावली मांग ली। विश्वविद्यालय स्तर से यूजीसी के नए मानक के आधार पर चयन समिति का नया प्रारूप जुलाई 2011 में ही सरकार को भेज दिया गया। इसके तहत चयन समिति में विशेषज्ञ के रूप में कुलपति को शामिल किया गया है जबकि पहले कुलाधिपति होता था। साथ ही समिति में संकाय प्रमुखों को भी शामिल किया गया है। लेकिन यूनिवर्सिटीज से प्राप्त संशोधित नियमावली के आधार पर जो नया विधेयक लाना है उसके लिए राज्य सरकार प्रयत्नशीन ही नहीं दिख रही।
एक बारगी लगा था कि यूनिवर्सिटी और डिग्री कॉलेजों के शिक्षकों के आंदोलन से सरकार इस मुद्दे पर कुछ निर्णय लेगी और बजट सत्र में विधेयक लाया जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं। ऐसे में चालू सत्र तो जैसे तैसे निकल गया पर 30 जून को सेवानिवृत्ति के बाद नए सत्र में यूनिवर्सिटीज में शिक्षकों की और कमी होगी। आवासीय विश्वविद्यालय शिक्षक महासंघ के प्रांतीय अध्यक्ष और गोरखपुर यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रो.चितरंजन मिश्र के मुताबिक वर्तमान में ही गोरखपुर यूनिवर्सिटी में स्वीकृत 357 पदों के सापेक्ष 150 पद रिक्त हैं। ऐसे में जुलाई से इनकी संख्या 161 हो जाएगी। ऐसे ही अन्य यूनिवर्सिटीज में होगा। प्रो. मिश्र का कहना है कि मानक के अनुरूप शिक्षकोें की नियुक्ति के बगैर यूनिवर्सिटीज में शैक्षणिक गुणवत्ता की बात बेमानी है।
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