इतिहास परंपरा के संवाहक हैं पुरा अभिलेख

Gorakhpur Updated Wed, 30 Jan 2013 05:30 AM IST
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गोरखपुर। भारतीय इतिहास परंपरा का संवाहक है पुराअभिलेख। ये इतिहास संरचना के ठोस आधार हैं। इसमें संपादन की गुंजाइश नहीं होती। ये पूरी तरह से आब्जेक्टिव होते हैं। इससे मिलने वाली सूचना वस्तुनिष्ठ होती है। यूनिवर्सिटी के प्राचीन इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित ‘भारतीय पुराभिलेखों में इतिहास परंपरा एवं संस्कृति’विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन का यह रहा निष्कर्ष।
संवाद भवन में आयोजि संगोष्ठी के पहले दिन दो सत्र हुए। इसमें मुख्य रूप से अभिलेखों के प्रकारों पर चर्चा की गई। बताया गया कि पुराअभिलेख ऐसा साहित्य नहीं जिसक ा संपादन कर कोई अपने ढंग से कुछ भी लिख सके। इससे इतिहास ही बिगड़ जाएगा। बहुतेरे राजवंश और राजाओं के सूचना स्त्रत्तेत सिर्फ अभिलेख ही होते हैं। हालांकि कभी-कभी इसमें विरोधाभास भी पैदा हो जाता है जिसके चलते सूचनाएं खंडित-मंडित होती रहती हैं। अगर सम्राट अशोक के विषय में ही प्राप्त अभिलेखों की चर्चा की जाए तो कुछ अभिलेख ऐसे भी मिलते हैं जिसमें उन्हें क्रूर शासक के रूप में दिखाया गया है लेकिन बाद के अभिलेख ही उन्हें उदारवादी बताता है। इस तरह के कई उदाहरण हो सकते हैं। बावजूद इसके प्राप्त पुरा अभिलेखों के आधार पर ही तत्कालीन काल के इतिहास का सृजन होता है। संगोष्ठी में ये विचार भी आए कि पुरा अभिलेखों के कई पक्षों पर अभी तक अध्ययन नहीं हो सका है। इसमें प्रणेता और काव्य और इतिहास की संचेतना हैं जिन पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

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