शांतिदूत की अगवानी के लिए शहर के चर्च तैयार

Gorakhpur Updated Mon, 24 Dec 2012 05:30 AM IST
गोरखपुर । शहर के चर्चों ने यहां की सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण अध्याय तो जोड़ा ही है यहां शैक्षिक वातावरण बनाने में इनका योगदान अविस्मरणीय है। स्थापत्य की दृष्टि से भी ये चर्च बेजोड़ हैं। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जिनके निर्माण के 200 वर्ष पूरे होने को हैं। ये चर्च पर्यटन विभाग की प्राचीन धरोहरों की सूची में शामिल कर लिए गए हैं। यह पूर्वांचल के लिए गौरव की बात है। क्रिसमस के अवसर पर इन गिरिजाघरों की सुंदर सजावट की गई है। प्रभु यीशु की आराधना के लिए विशेष तैयारियां की जा रही हैँ। कहीं कैरल सांग की गूंज है तो तो कहीं विशेष केक बनाए जा रहा है। समूची कायनात शांति दूत की अगवानी के लिए पलक पांवड़े बिछाए है। इस अवसर पर शहर के कुछ खास चर्चों की खासियत पर अर्जुमंद बानो की रिपोर्ट-

सेंट जोसेफ चर्च कैथेड्रल सिविल लाइंस :
सिविल लाइंस स्थित यह चर्च 1860 में फादर रैफेल ऑफ लिवानो द्वारा निर्मित कराया गया। उस समय यह चर्च खास कर कैथलिक अंग्रेज फौजियों के लिए बनाया गया था। उनके गोरखपुर से जाने के बाद बंद कर दिया गया। यह दुबारा 1892 फिर से खुला। बाद में यह सेंट्रल स्टेशन बन गया जहां से मिशनरी गोंडा बस्ती, आजमगढ़ और बलिया जिलों का दौरा करने लगी। फादर जोस मिनीजिरियल के अनुसार पहले चर्च में बहुत से दरवाजे थे जो बाद में खिड़कियों में बदल दिए गए। पहले वहां बंदूक रखने जूते साफ करने की भी व्यवस्था थी। 1974 में बंदूक रखने की व्यवस्था भी खत्म हो गई। वर्तमान मेें इस चर्च के फादर संतोष सैबेस्टीन हैं।

सेंट ऐंथनीज पैरिश धर्मपुर :
सेंट ऐंथनीज पैरिश, धर्मपुर, सेंट ऐंथनीज चर्च 23 अक्टूबर 1978 में स्थापित हुआ। पहले चर्च की बिल्डिंग न होने के कारण ऐंथनीज स्कूल का हॉल ही प्रार्थना के लिए उपयोग किया जाता था। जुलाई 1984 में सीएसटी फादर्स ने धर्मपुर में दो एकड़ जमीन खरीदी और शेड डाल कर स्कूल प्रांरभ किया। 1985 में चर्च की नींव रखी गयी, और 14 फरवरी 1988 में यह तैयार हुआ। फादर जोस मंजिरियल की लगातार एवं मजबूत कोशिशों के कारण यह चर्च एक पैरिश बन गया।

माउंट कार्मल पैरिश, पादरी बाजार :
1991 के डायोसीज ने पादरी बाजार में एक जमीन था टुकड़ा खरीदा। केवल तीन कक्षाओं से नर्सरी स्कूल की स्थापना की। फादर जोस मंजिरियल फादर पुथुसेरी और फादर संतोष के अथक प्रयासोें से स्कूलों ने जल्दी ही तरक्की कर ली। 1999 में वहां माउंट कार्मल चर्च की स्थापना हुई। फादर जोस इस बारे में चर्चा करते हुए भावुक हो जाते है और यह कहने लगते हैं कि कैसे सब कुछ शुरू हुआ था। फादर संतोष को आज भी उन कार्मल का पहला पैरेन्टस डे याद है जब दो खिड़की पर्दों पर पैरेंटस डे लिख कर समारोह की शुरूआत की गयी थी। आज यह चर्च पैरिश की स्तर पा चुका है। और निरंतर सेवा की ओर अग्रसर है।

सेंट जौंस चर्च बशारतपुर
सेंट जोंस चर्च शहर का सबसे पुराना चर्च है। इसकी स्थापना 1823 में हुयी थी। उस समय बशरतपुर गांव था जिसमं ज्यादातर ईसाई थे। चर्च से जुड़ा हुआ एक लड़कियों का स्कूल था। सेंट जोंस जूनियर हाई स्कूल आज भी यह अपनी पुरानी भव्यता के साथ बशारतपुर में स्थापित है।

सेंट एंड्रयूज चर्च, कौवाबाग
सेंट्र एण्ड्रयूज चर्च की स्थापना 1899 में हुयी। यह चर्च रेलवे के परिसर में है। और मूलत: अंग्र्रेज अफसरों के लिए बनाया गया था। स्वतंत्रता से पहले यहां पर पादरी अंग्रेज ही होते थे। स्वतंत्रता के बाद भारतीय मूल के लोग भी इसके पादरी होने लगे। 1994 से पहले इस चर्च की सारी प्रार्थना सभाएं अंग्रेजी में होती थी। लेकिन 1994 के बाद हिन्दी में भी सभाएं होने लगी। सेंट एंड्रूयूज चर्च में पादरी हिलरी जसवंत कहते हैं कि धीरे धीरे ऐंग्लोइंडियन लोग शहर से पलायन करने लगे और हिन्दी भाषी लोगों की संख्या बढ़ने लगी। इस सबकी आवश्यकताओं को ध्यान रखते हुए हिन्दी में सभाएं शुरू की गयी। और आज एक रविवार को हिन्दी में तथा दूसरे रविवार को अंग्रेजी में प्रार्थना सभा होती है। अंग्रेजी भाषा तथा हिन्दी भाषा दोनों ही समुदाय के लोग आपस में मिलते हैं और एक बड़ा ही अच्छा माहौल बनता है।

क्राइस्ट चर्च : क्राइस्ट चर्च शास्त्री चौक की स्थापना 1825 में प्राइवेट सब्सक्रिप्सन द्वारा हुई थी। इस चर्च में बड़ा संभाल कर रखा गया है। यह आज भी वैसा ही है जहां 1825 में था। इसकी इमारत में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यहा क्रिसमर्स इंस्टर और नव वर्ष बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।


कैथेड्रल : उस चर्च को कहते ैहं जहां बिशप बैठते हैं।
पैरिश : बड़े चर्च को कहते हैं
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