भारतीय संस्कृति का दर्पण है कालिदास काव्य : प्रो. शुक्ल

Gorakhpur Updated Fri, 14 Dec 2012 05:30 AM IST
गोरखपुर। कालिदास विश्व के महान कवियों में अग्रणी हैं। उन्हें किसी देशकाल की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। संपूर्ण भारतीय संस्कृति को आत्मसात कर उन्होंने उसे अपने काव्य के माध्यम से व्यक्त किया है। उनके काव्य का कथानक देशकाल परिस्थिति से मुक्त मानव समाज के दर्पण के रूप में प्रतिबिंबित होता है। यह कहना है यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. करुणेश शुक्ल का। वह चंद्रकांति रमावती देवी आर्य महिला पीजी कॉलेज में कालिदास जयंती समारोह को संबोधित कर रहे थे।
प्रो. शुक्ल ने कहा कि कालिदास ने भारतीय जीवन दर्शन और राष्ट्रीय जीवन मूल्यों को अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। उनकी रचनाओं में भाव, भाषा, कथानक, माधुर्य, मानवीय संवेदना, प्रकृति सौंदर्य का मानवीकरण एवं प्रकृति चित्रण जितने मर्यादित ढंग से परिलक्षित होता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। सही अर्थों में उनका काव्य भारतीय संस्कृति का दर्पण है। इस मौके पर कॉलेज के प्रबंधक डॉ. रामरक्षा पांडेय ने कहा कि कालिदास की रचना अभिज्ञान शाकुंतलम् में उनकी नाट्यशैली एवं कलात्मक कौशल का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है। कुमारसंभवम् में हिमालय वर्णन, रघुवंश में दिलीप की गो सेवा और रघु की उदारता और इंदुमति का विलाप आदि ऐसे प्रसंग हैं जो काव्य के मानव के अंत: एवं बाह्य प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण में बेजोड़ हैं। उनकी रचनाएं वसुधैव कुटुंबकम् का आदर्श प्रस्तुत करती हैं। कॉलेज के संस्कृत विभाग की प्रवक्ता डॉ. विजय लक्ष्मी सिंह ने कहा कि कालिदास की रचनाओं में नवीनता, रमणीयता एवं काव्य सौष्ठव की अद्भुत क्षमता का समावेश है।
इस अवसर पर श्वेता, रीना, खुशबू, स्तुति, निधि, तृप्ति ने अभिज्ञान शाकुंतलम् के चतुर्थ अंक शकुंतला पतिगृह गमनम् पर आधारित लघु नाटिका का मंचन किया। ऋतुसंहारम् के श्लोकों का तन्वी, अपूर्वा और अमरलता ने सस्वर पाठ किया तो रीमा ने मोहक नृत्य प्रस्तुत कर दर्शक ों का दिल जीता। प्राचार्य डॉ. रंजना ने आभार जताया। डॉ. अर्चना शुक्ला ने संचालन किया।

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