प्रतिरोध के तेज स्वर से हम देंगे पश्चिम को चुनौती: डॉ. केदारनाथ सिंह

Gorakhpur Updated Mon, 05 Nov 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। सोवियत संघ के विघटन के तुरंत बाद और 21वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी साम्राज्यवाद तेजी से आक्रामक हुआ है और इसी के साथ एशिया महाद्वीप और भारत में सांस्कृतिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। दुनिया के एकध्रुवीय होने के साथ अमेरिका की ज्यादतियां ज्यों-ज्यों बढ़ी हैं, इसके साथ ही बढ़ी हैं भारतीय संस्कृतिकर्मियों की जिम्मेदारियां। यह अच्छी बात है कि भारत के जिम्मेदार लोगों को इस बड़ी चुनौती का एहसास है, खास करके युवा पीढ़ी को, और वह इन चुनौतियों से लड़ने के लिए कमर कसे होने के साथ इनसे हार नहीं मानने के लिए कृतसंकल्प है। वह प्रतिरोध के तेज स्वर से पश्चिम की इस चुनौती को जवाब देने को तैयार है। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एमेरिटस प्रोफेसर केदारनाथ सिंह का, जिनसे रविवार को भारतीय जनमानस के समक्ष उपस्थित समकालीन सांस्कृतिक चुनौतियों के संदर्भ में बात की गई-
प्रो. केदारनाथ सिंह ने कहा कि एशिया और भारतीय संस्कृति लंबे समय से पश्चिमी संस्कृति के दबाव का सामना कर रही है। अमेरिकी साम्राज्यवाद का वर्चस्व दिनोंदिन बढ़ रहा है। सोवियतसंघ के विघटन के बाद यह आशा की जा रही थी चीन की वामपंथी सत्ता उसके अभाव की पूर्ति करेगी। पर हम पाते हैं कि चीन भी बुरी तरह बाजारवाद के शिकंजे में है। आज समूचा विश्व बाजार किसी न किसी रूप में विश्व बैंक द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संचालित हो रहा है। यह सब जानते है कि विश्व बैंक की नीतियां अमेरिका के अनुसार तय होती हैं। दरअसल संस्कृति जिसमें साहित्य, कला और दर्शन मुख्य रूप से आते हैं। ये सब इस बदली हुई परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। बाजारवाद और भूमंडलीकरण अमेरिकीकरण का ही एक रूप है जो हमारी सांस्कृतिक गतिविधियों के सामने संकट के रूप में उपस्थित है। दरअसल यही चुनौतियां एशिया और भारत के संस्कृतिकर्मियों के सामने हैं।
वह आगे कहते हैं कि इसके बाद भी मैं निराश होने के बहुत कारण नहीं देखता। आज का जो हिंदी लेखन है वह अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ अमेरिकी साम्राज्यवादी सांस्कृतिक हमलों का सामना कर रहा है, जिसे खास तौर पर युवा लेखन में देखा जा सकता है। पर केवल युवा नहीं बल्कि आज संपूर्ण भारतीय लेखक उसका सामना कर रहा है। अमेरिकी पूंजीवाद का प्रतिरोध कुछ अच्छी फिल्मों में भी देखा जा रहा है। बल्कि आज का जो वैचारिक लेखन है वह भी इसका सामना इस रूप में कर रहा है कि वह पश्चिम द्वारा प्रस्तावित सिद्धांतों और धारणाओं से मुक्त होकर काम कर रहा है। मेरा विश्वास है कि इस सदी में प्रतिरोध का यह स्वर तेज होगा और धीरे-धीरे अपनी वास्तविकताओं के साथ एक नया संबंध स्थापित करते हुए विश्व सांस्कृतिक मंच एक नई पहल के रूप में प्रस्तुत होगा। जो पूरी तरह से पूरब की आवाज होगी और जो पश्चिम को कड़ी चुनौती देगी।

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