शक्ति की भक्ति में डूबा शहर

Gorakhpur Updated Sat, 20 Oct 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। शारदीय नवरात्र में शक्ति की भक्ति में पूरा शहर डूब गया है। माता के जयकारे के साथ मृड़मयी देवी प्रतिमाओं को पंडालों तक पहुंचने का सिलसिला जोर पकड़ चुका है। बंगाली परिवार मां भगवती के दर्शन को मचल रहे हैं। रविवार (आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि) को जगत जननी की मृड़मयी प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। इसके साथ ही सभी प्रतिमाएं चिन्मयी हो उठेंगी। उसी दिन से महिषासुर मर्दनी का दर्शन पूजन शुरू हो जाएगा।
दुर्गा पूजा की तैयारी यूं तो भाद्रपद में ही शुरू हो गई थी। शारदीय नवरात्र आते ही ज्यादातर पूजा पंडाल आकार ले चुके थे। अब उन्हें फिनिशिंग टच दिया जा रहा है। कई पंडालों में भगवती की प्रतिमाएं स्थापित भी हो चुकी हैं। यूं तो देवी भगवती की आराधना में सभी लीन हैं पर खास तौर से बंगाली परिवार में मां के आवाहन की उत्सुकता कहीं ज्यादा हैं। बंगाली परंपरा के अंतर्गत पूजन अर्चन करने वाले पूजा पंडालों में शनिवार षष्ठी तिथि को तड़के चार बजे पंडालों में प्रभाती (चंडीपाठ और देवी गीत का गान) होगी और शाम सात बजे घट स्थापित करने के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाएगा। महिषासुर मर्दनी की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा सप्तमी तिथि को अक ाल बोधन, कल्पारंभ और कौला बहु (केले के छोटे पौधे को देते हैं देवी का स्वरूप) के पूजन के साथ होगी। सुबह 9.27 बजे तक होगा सप्तमी पूजन। इसके लिए काशी से बुलाए गए हैं पुरोहित। उसके बाद भोग प्रसाद का वितरण होगा। शाम ढलते ही पूजा पंडालों के आसपास की फिजा में घुल जाएगी धूप, लोहबान की गमक। मालदा से बुलाए गए ढाकियों के ढाक की थाप पर धनुची नृत्य की धूम होगी। महाअष्टमी पूजन 22 अक्तूबर की सुबह 8.30 बजे होगा। शाम 6.30 बजे शाम को संध्या आरती होगी। रात्रि 12.17 से 1.05 बजे तक होगा महानिशा पूजन। रात में ही भोग प्रसाद वितरित किया जाएगा। अगले दिन प्रात:8.31 बजे महानवमी पूजन, पुष्पांजलि अर्पण होगा। 24 अक्तूबर क ी सुबह 8.31 बजे तक दशमी पूजन के साथ अपराजिता पूजन होगा। प्रतिमा विसर्जन के लिए शोभायात्र शाम 5.30 बजे निकलेगी।

बंगाली पूजा पंडालों में परंपरा का निर्वाह
गोरखपुर। यूं तो प्राय: हर पूजा पंडाल में पूरी आस्था और विश्वास के साथ भगवती की आरधना होगी। लेकिन बंगाली पूजा पंडालों (पंडाल दुर्गाबाड़ी और रेलवे लोको ग्राउंड के पंडाल) में परंपरागत रूप से तिथि, समय और पूजन विधि पर खास महत्व दिया जाएगा। इन पंडालों में स्थापित प्रतिमाओं में कोई तड़क-भड़क नहीं मिलेगी। दुर्गा बाड़ी दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष एमके चटर्जी बताते हैं कि यहां परंपरागत रूप से दुर्गा बाड़ी में एक बैकग्राउंड पर ही मध्य में महिषासुर मर्दनी, दाहिनी ओर प्रथम पूज्य श्री गणेश, लक्ष्मी और कौला बहु को रखा जाएगा। बाईं ओर होगी मां सरस्वती और कार्तिकेय की प्रतिमा। एनई रेलवे लोको स्पोर्ट्स ग्राउंड दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष शांतनु गांगुली बताते हैं कि दुर्गा बाड़ी और यहां की पूजन विधि में कोई अंतर नहीं है। अंतर है तो प्रतिमा में लोको स्पोर्ट्स ग्राउंड पर स्थापित होने वाली प्रतिमा एक बैकग्राउंड में नहीं बल्कि अलग-अलग होंगी पर उनका क्रम वही रहेगा। श्री चटर्जी और श्री गांगुली का कहना है कि प्रतिमा स्थापित करने के लिए पंडाल चाहिए सो लगाया गया है लेकिन इसमें कोई तड़क-भड़क नहीं होती है। रेलवे स्टेशन (पूर्व) दुर्गापूजा समिति के आयोजक सुदामा सिंह बताते हैं कि नवरात्र के पहले दिन ही कलश स्थापित कर दिया गया था। अब अलग से घट स्थापित नहीं होगा। शनिवार, षष्टी की रात में आठ बजे मूल नक्षत्र में प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर दी जाएगी। लाल और गेरुआ रंग से सजे पंडाल को मंदिर का स्वरूप दिया गया है। धर्मशाला क्षेत्र में श्री श्री दुर्गापूजा बोल बम नवयुवक कांवरिया समिति द्वारा बनाए गए पंडाल को सजाने का काम युद्ध स्तर पर जारी है। ऐसे ही असुरन में भी तैयारी चल रही है। इन सभी गैर बंगाली हर पूजा पंडालों में भी ऐसा ही होगा। तीन दिनों तक पूरी आस्था और धूम-धड़ाके नृत्य संगीत के साथ पूजन अर्चन होगा।


गोरखपुर में 105 वर्ष पूर्व शुरू हुई थी बंगाली दुर्गा पूजा
गोरखपुर। दुर्गा बाड़ी दुर्गापूजा समिति के अध्यक्ष एमके चटर्जी बताते हैं कि गोरखपुर में बांग्ला शैली की दुर्गा पूजा का आरंभ 1896 में प्रथम भारतीय सिविल सर्जन डा. योगेश्वर राय ने सिविल लाइन अस्पताल परिसर में किया था। यहां 1902 तक दूर्गा पूजा मनाई गई, 1903 में शहर में प्लेग फैलने के चलते उस साल पूजा नहीं मनाई गई। फिर इस्लामिया कालेज के प्रधानाचार्य राय साहब अधीर नाथ चटर्जी और राधा विनोद ने कालेज परिसर में पूजा शुरू की। 1910 में पूजा स्थल फिर बदला और अहलदादपुरमें शुरू हुआ पूूजन-अर्चन, 1928 फिर स्थान बदला और भगवती प्रसाद रईस के आहते में होने लगी पूजा। इसके बाद कुछ दिनों तक चरणलाल चौराहा स्थित कंबलघर में भी पूजा हुई लेकिन 1942 में भवन के सरकारी अधिग्रहण के बाद दीवान बाजार में होने लगा पूजन। 1953 में बाबू महादेव प्रसाद ने रईस ने पिता भगवती प्रसाद क ी स्मृति में दुर्गाबाड़ी की जमीन पूूजा समिति को भूखंड दिया और 15 अगस्त को यहां भूमि पूजन हुआ। तब से यहीं पर हो रही है पूजा। रेलवे लोक स्पोर्ट्स ग्राउंड पूजा समिति के अध्यक्ष शांतनु गांगुली के अनुसार यहां 1971 से पूजा हो रही है। रेलवे स्टेशन (पूर्व) पूजा समिति के संस्थापक सुदामा सिंह के अनुसार 43 साल से यहां पंडाल बना कर देवी की अभ्यर्थना की जाती है।

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