भारतीय वैज्ञानिकों के प्रकाशनों ने जगाई उम्मीद - चतुर्वेदी

Gorakhpur Updated Fri, 19 Oct 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। भारतीय वैज्ञानिकों के शोध प्रकाशनों ने उम्मीद जगाई है। प्रतिष्ठा प्राप्त शोध पत्रिकाओं में 12 फीसदी की दर से वैज्ञानिक प्रकाशनों की वृद्धि दर्ज की गई है। इस क्षेत्र में भारत 15वें से नवें पायदान पर आ गया है। अलबत्ता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयीय शिक्षा का परिदृश्य निराशाजनक है। उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में शोध का स्तर उत्कृष्ट नहीं है। इसे तोड़कर अपनी साख कायम करना हमारे विश्वविद्यालयों की आज की सबसे बड़ी चुनौती है। योजना आयोग के सदस्य पद्म भूषण बीके चतुर्वेदी ने वृहस्पतिवार को दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि यह कहा। इस अवसर विश्वविद्यालय के 77 मेधावी विद्यार्थियों कोे गोल्ड मेडल दिए गए। मेडल पाने वालों में 53 छात्राएं हैं। समारोह में कुलाधिपति और राज्यपाल बीएल जोशी को आना था पर वे अस्वस्थ होने के कारण शामिल नहीं हो सके। कुलपित प्रो.पीसी त्रिवेदी ने मुख्य अतिथि को मान पत्र, शाल और स्मृति चिह्न भेंट किया।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए गुरुवार का दिन यादगार बन गया। दीक्षांत समारोह में भाग लेकर सभी रोमांचित थे। सबकी नजर मुख्य अतिथि के उद्बोधन की ओर लगी थीं। मेधावियों को गोल्ड मेडल से नवाजने के बाद मुख्य अतिथि बीके चतुर्वेदी ने बहुत भावुक होकर पूर्वांचल की धरती से नाता जोड़ा। विद्यार्थियों को उनके लक्ष्य और कर्तव्य की याद दिलाई। कहा सफलता के लिए दृढ़ संकल्प और उत्कृष्टता जरूरी है। चुनौतियां वैश्विक हैं। उनके अनुरूप अपने को ढालना होगा। इसी क्रम में उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों की शैक्षिक गुणवत्ता में दिनोंदिन आ रही गिरावट को रेखांकित किया। कहा चुनौतियां और प्रतिस्पर्धाएं ग्लोबल हो गई हैं। ऐसे में उत्कृष्टता से ही हम अपना स्थान बना सकते हैं। अपनी बात को और दमदारी से रखते हुए वैश्विक सर्वेक्षणों का हवाला दिया। कहा विश्व के शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों में अपने देश के किसी भी विश्वविद्यालय को कोई स्थान नहीं मिला है। ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अप्रीका) में भारत ही है जिसका कोई भी विश्वविद्यालय मानक पर खरा नहीं उतरा। श्रेष्ठ 300 एशियायी विश्वविद्यालयों में भी हमारे 11 संस्थान ही हैं। पर इस निराशा के बीच हमारे वैज्ञानिक शोध प्रकाशनों ने उम्मीद की किरण दिखाई है। जिस गति से प्रतिष्ठा प्राप्त पत्रिकाओं में भारतीय वैज्ञानिकों के शोध प्रकाशनों ने स्थान बनाया है वह सुखद है। इस क्षेत्र में भारत 2003 में 15वें स्थान पर था, 2010 में नवें स्थान पर आ गया है।
उन्होंने कहा कि उच्च और तकनीकी शिक्षा के संस्थान जिस गति से खुल रहे हैं गुणवत्ता नहीं बढ़ रही है। इसका असर चतुर्दिक पड़ रहा है। प्राथमिक शिक्षा का भी बुरा हाल है। कहा अगर इस पर ध्यान नहीं दिया तो हमारी युवा शक्ति आपदा बन जाएगी। उन्होंने सरकारी कार्यालयों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाया। कहा कि लोगों को बुनियादी सुविधाएं भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही है। इसी का नतीजा है कि विदेशी उद्यमी यहां निवेश करने से कतरा रहे हैं। राज्यपाल का भाषण हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुरेंद्र दुबे ने पढ़ा। कुलाधिपति के कार्यों को कुलपति ने निबटाया।

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