गरीबी रेखा की सीमा 26 रुपये हास्यास्पद

Gorakhpur Updated Mon, 15 Oct 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। आज शहरों का विकास हो रहा है, लेकिन गांवों का विकास नहीं हो रहा है। गांवों में मनरेगा जैसे कार्यक्रम चलाकर सरकार ने कृषि मजदूरों को थोड़ी राहत तो दी है, लेकिन कृषि मजदूर इससे अपने परिवार का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है। भारत सरकार की गरीबी रेखा की सीमा छब्बीस रुपये प्रतिदिन की आय को तय करना हास्यास्पद है। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के अर्थशास्त्र विभाग के आचार्य प्रो. आरपी सिंह ने यह विचार व्यक्त किया।
प्रो. आरपी सिंह दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे। ‘ग्रामीण रोजगार योजनाएं एवं आर्थिक सामाजिक विकास’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में प्रो. सिंह ने कहा कि देश के अर्थशास्त्रियों को अब नए सिरे से भारत के सामाजिक आर्थिक विकास का स्वरूप निर्धारित करना चाहिए। गांवों में ग्रामीण औद्योगिकीकरण को लागू किए बिना गांवों से बेरोजगारी और गरीबी को दूर नहीं किया जा सकता। बतौर विशिष्ट अतिथि इविंग क्रिश्चियन कालेज इलाहाबाद के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विवेक निगम ने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। गोरखपुर यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. पीसी शुक्ला ने कहा कि एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुल बेरोजगारी नौ प्रतिशत है। यह आर्थिक प्रयास नहीं राजनीतिक प्रयास जान पड़ता है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कालेज के प्राचार्य डॉ. मयाशंकर सिंह ने यदि गांव वालों का तन मन और धन का विकास होगा तभी सामाजिक आर्थिक विकास समझा जा सकता है। संगोष्ठी में डॉ. गीता दत्त, डॉ. शैलेंद्र प्रताप, डॉ. श्रीपाल सिंह, डॉ. भगवान देव समेत अन्य मौजूद थे।

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