जिला पंचायत की बैठक में फिर हंगामा

Gorakhpur Updated Fri, 05 Oct 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। जिला पंचायत की गुरुवार को हुई बैठक में 25 अगस्त की विवादास्पद कार्यवृत्ति की पुष्टि नहीं हुई। तय हुआ कि सदस्यों का प्रस्ताव पूर्व की भांति शासन को जाएगा। शासन का जो भी निर्णय होगा सदस्य उस पर अमल करेंगे। सदस्यों के खिलाफ दर्ज मुकदमे की वापसी के मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं हो सका। सीडीओ और एएमए इस बिंदु पर अपनी राय स्पष्ट नहीं कर सके । सदन में कुछ सदस्य अधिकारियों पर हमलावर थे तो कुछ उनका बचाव करते नजर आए।
आज सदन की बैठक शुरू होते ही एसपी सिंह, शैलेंद्र सिंह, मदन तिवारी, संघर्षमणि, घनानंद यादव ने 27 सितम्बर की घटना के लिए अपर मुख्य अधिकारी को जिम्मेदार ठहराया। मदन तिवारी ने कहा कि विधानसभाओं में कुर्सियां चली हैं। संसद में गतिरोध पैदा हुआ है। सदस्य जनता के हक की आवाज उठाते हैं वह जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं पर किसी के विरुद्ध मुकदमा नहीं दर्ज होता है। यहां जो कुछ हुआ वह ठीक नहीं है। वहीं निर्मला पासवान ने कहा कि वह मुकदमे से नहीं डरने वाली। सीडीओ ने सदस्यों के साथ धोखा किया है। अधिकारी भी मुकदमा झेलने को तैयार रहेंगे। बैठक में सत्ता पक्ष के सदस्य के रूप में कुछ लोग आए तो कई लोगों ने विरोधी सदस्य की तरह उन पर निशाना साधा। वहीं जिला पंचायत अध्यक्ष साधना सिंह ने कहा कि जो भी समस्या है सदस्य उनके कार्यालय में चल कर व्यक्त करें, उसका समाधान होगा। उधर बैठक की समाप्ति पर सदस्य साधना सिंह के कार्यालय गए, यहां उन्हें पता चला कि एएमए सर्किट हाउस गए हैं। अंतत: अध्यक्ष ने आश्वासन दिया कि वह एएमए से मुकदमा वापसी की शर्त की जानकारी लेकर सदस्यों को अवगत करएंगी।
बता दें कि 25 अगस्त 2012 की बैठक में सदन की कार्यवृत्ति में लिखा गया था कि 7 जून और 25 जुलाई के शासनादेश के तहत सदस्य कार्य करने को तैयार हैं। जबकि सदस्यों ने कहीं इस बात को नहीं कहा था। बीआरजीएफ योजना में एक करोड़ अस्सी लाख का दूसरे का प्रस्ताव जोड़ दिया गया था। इस पर सदस्यों की आपत्ति थी। सदस्यों को जब उसकी जानकारी हुई तो उन्होंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया था। मामला तूल पकड़ने लगा तो जिला पंचायत की बैठक 27 सितंबर को बुलाई गई। लेकिन अचानक बैठक निरस्त कर दी गई। इसका कारण जानने जिला पंचायत पहुंच गए, वे 45 की संख्या में थे। विरोध में सदस्यों ने कहा कि जब जिला पंचायत को अपर मुख्य अधिकारी अपने ढंग से चलाएंगे तो ऐसे विभाग का क्या औचित्य है। तकरार व सदस्यों के रुख को देख अपर मुख्य अधिकारी ने पुलिस बुलवा लिया। सदस्यों को पुलिस वालों ने रोका तो विवाद हो गया। पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो सदस्य भी उग्र हो गए। प्रशासनिक अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद विवाद शांत हुआ। पर अपर मुख्य अधिकारी ने पांच लोगाें के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करा दिया।

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