संस्कारों की थाती सौंपकर विदा हुई विवेक एक्सप्रेस

Gorakhpur Updated Fri, 13 Jul 2012 12:00 PM IST
गोरखपुर। तीन दिनों में ‘विवेक एक्सप्रेस’ ने उस पीढ़ी को स्वामी विवेकानन्द के संदेशों और संस्कारों से परिचित कराया जिनमें उन्होंने भारत को बदलने की असीम ऊर्जा और संभावना देखी थी। विचार जब आचरण की प्रयोगशाला में तपकर जनमानस के बीच आते हैं तो उनमें कितनी ताकत होती है, प्रदर्शनी देखने आए बच्चों युवाओं वयस्कों में यह बखूबी महसूस किया गया। स्वामी जी के विलक्षण विचारों और चित्रों को देख उनकी आंखों की चमक को देखना यकीनन दुर्लभ क्षण था।
प्रदर्शनी में लोगों ने स्वामी विवेकानन्द और उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को देख एक सत्य के दो पक्षों का एक साथ साक्षात्कार किया। दरअसल स्वामी रामकृष्ण दर्शन हैं तो स्वामी विवेकानन्द उसके क्रियापक्ष की मुखर अभिव्यक्ति।
गोरखपुर का रेलवे प्लेटफार्म इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी का साक्षी बना। इस अवसर ने ऐसे युवा संन्यासी के आशा और रचनात्मक ऊर्जा से संपन्न विचारों की थाती दी जिसे भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का पिता कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। महर्षि अरविंद ने यूं ही नहीं कहा है ‘पश्चिमी जगत में विवेकानन्द को जो सफलता मिली वही इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को नहीं जगा है वरन् वह विश्व विजय करके दम लेगा।’ अभिनव भारत को जिस दिशा की ओर जाना था उसका स्पष्ट संकेत विवेकानन्द ने दिया। दरअसल विवेकानन्द वह सेतु हैं जिस पर प्राचीन और नवीन भारत परस्पर आलिंगन करते दिखते हैं। अमेरिका में कोई 120 साल पहले हुई सर्व धर्म सभा में विवेकानन्द ने जिस प्रखरता और आत्मविश्वास के साथ भारत की सांस्कृतिक चेतना को प्रतिष्ठित किया था उसे आधुनिक भारत की नई पीढ़ी की स्मृतियों में संजोने के लिए भी ऐसी प्रदर्शनी जरूरी है। क्योंकि काल के प्रवाह में ऐसे संदेशों की अनुगूंज मद्धिम पड़ने लगी है और विकृतियां पनपने लगी हैं। ऐसे वक्त में अगर सशक्त विचारों के बीज सुपात्रों में पड़ते हैं तो विवेकानन्द जैसी विभूति का प्रादुर्भाव होता है। स्वामी रामकृष्ण ने ऐसे ही सुपात्र में अपनी साधना का प्रखर तेज प्रदीप्त किया था और समूची कायनात आलोकित हो गई।
39 वर्ष के अल्प जीवन में स्वामी विवेकानन्द ने भारतवासियों में आत्मगौरव की भावना प्रेरित कर उन्हें अपनी संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं का योग्य उत्तराधिकारी बनाया। अपनी समृद्धि और सफलता के मद में चूर पश्चिम के लोगों को भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ताकत का एहसास कराया। प्रदर्शनी ने यह संदेश दिया कि विवेकानन्द वह समुद्र हैं, जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता, उपनिषद और विज्ञान सब के सब समाहित हैं। गोरक्षनगरी के लोगों के लिए यह अविस्मरणीय रहेगा।


ये हैं योद्धा संन्यासी के संदेश
0 जब मनुष्य दुर्बल और क्षीण हो तब हवन में घृत जलाना अमानुषिक कार्य है। संसार के अगणित नर-नारियों में परमात्मा भासमान हैं।
0 मेरे जीवन का परम ध्येय उस ईश्वर के विरुद्ध संघर्ष करना है जो परलोक में आनंद देने के बहाने इस लोक में मुझे रोटियों से वंचित रखता है।
0 अगर तुम्हारा पड़ोसी भूख से मर रहा हो तो मंदिर में भोग लगाने के बजाय उसकी क्षुधा तृप्त करो। उसे खिलाना साक्षात नारायण को भोग लगाना है।
0 वास्तविक शिव की पूजा निर्धन और दरिद्र की पूजा है, रोगी और कमजोर की पूजा है।
0 मैं भारत में लोहे की मांसपेशियों और फौलाद की नाड़ी तथा धमनी देखना चाहता हूं क्योंकि इन्हीं के भीतर वह मन निवास करता है जो शम्पाओं और वज्र से निर्मित होता है, शक्ति, पौरुष, क्षात्र-वीर्य और ब्राह्म-तेज इनके समन्वय से भारत की नई मानवता का निर्माण होना चाहिए।

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