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देश को दिलाया गोल्ड, पर सम्मान को तरस गई बेटी

गोंडा Updated Fri, 27 Oct 2017 12:00 AM IST
गोंडा में सोनिया कुमारी को पुरस्कृत करते डीएम जेबी सिंह।
गोंडा में सोनिया कुमारी को पुरस्कृत करते डीएम जेबी सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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जिस बेटी ने दुनिया में भारत का परचम लहरा कर गोल्ड मेडल दिया, वह सम्मान के दो लफ्ज सुनने को तरस गई। कबड्डी जैसे खेल में दुनिया में भारत की ताकत एहसास कराने वाली इस खिलाड़ी को न तो सम्मान के दो फूल मिले और न ही प्रशंसा के दो शब्द। जी हां, यह वह कड़वा सच है जो समाज में बेटियों के कद्र की सच्चाई जानने के लिए काफी है। 
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मंगलवार से शुरू हुए राज्यस्तरीय महिला ओपेन कबड्डी टीम में आजमगढ़ की कोच बनकर आई गोल्ड मेडलिस्ट सोनिया कुमारी की आंखें उस समय छलक आईं जब यहां के जिलाधिकारी जेबी सिंह व क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी नसरीन बानो ने उन्हें सम्मानित किया।

अमर उजाला से हुई खास बातचीत में सोनिया कुमारी ने बताया कि बेटियों को आगे बढ़ाने के दावे चाहे कितने ही क्यों न किए जाएं, लेकिन समाज अब भी बेटियों के साथ भेदभाव बरतने से नहीं चूकता है। उसने बताया कि वह मूल रूप से गाजीपुर की निवासिनी है जहां उसके पिता रामायण राव सेना में थे जो अब सेवानिवृत्त होकर पुलिस में हैं।

एक भाई रामानंद सेना में जबकि दूसरा भाई पुलिस में है। उसे भी आरपीएफ में दरोगा की नौकरी मिली थी, लेकिन उसकी रुचि शुरूआत से ही कबड्डी में थी। इसलिए वह 1996 में कक्षा छह से ही खेलने में जुट गई और खेल को ही कैरियर बनाने का इरादा कर लिया।

उसने बताया कि उसे अच्छी तरह से याद है जब उसे कबड्डी का अभ्यास करने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं मिलता था। उसने कई बार खुद अकेे ले अभ्यास किया है, क्योंकि कबड्डी जिसे लड़कों का खेल माना जाता था, उसे कोई अपनी बेटी को खेलने नहीं देना चाहता था। लोगों ने यहां तक कहा कि कैसी बेटी है जो हाफ पैंट पहन सबके सामने व साथ खेलेगी लेकिन उसके परिवारवालों ने इसकी परवाह नहीं की।

उसकी मऊ निवासी बीएसएफ में कमांडो जयप्रकाश से शादी हुई तो उन्होंने भी परिवारवालों की तरह उसका सहयोग किया। कबड्डी के सचिव मो.अकरम, अमित तोमर की प्रेरणा व पति के सहयोग से उसने एनआईओएस व बीपीईएड और 1999 से 2008 तक यूपी की बेस्ट कबड्डी प्लेयर रही।

इस दौरान 2016 में वियतनाम में हुई अंतरराष्ट्रीय महिला कबड्डी प्रतियोगिता में यूपी का प्रतिनिधित्व करने वाली वह अकेली खिलाड़ी थी, जिसे टीम का कोच भी बनाया गया। सेमीफाइनल मुकाबले में भारत कोरिया को हराकर फाइनल पहुंचा। जहां उसका मुकबला थाईलैंड से हुआ जिसमेें भारत गोल्ड मेडलिस्ट रहा।

वह कहती है कि जब उसने दुनिया के मैदान में खुद को अकेला पाया तो वहीं फैसला कर लिया कि अब वह अपने देश व प्रदेश की बेटियों को यहां तक पहुंचाने के लिए संघर्ष करेगी। दुनिया से गोल्ड मेडल छीनकर घर लौटी इस बेटी को सम्मान के दो फूल भी नहीं मिले और न ही किसी अधिकारी व जनप्रतिनिधि ने प्रशंसा के दो शब्द कहना उचित समझा।

यही नहीं, उसने स्पोर्ट्स आफीसर बनने के लिए इंटरव्यू भी दिया, लेकिन वह सपना भी अधूरा रह गया। उसका दर्द था कि भले ही परिवार ने उसे प्रोत्साहित किया लेकिन समाज तथा सरकार में बैठे रहनुमा व अफसर मनोबल तोड़ने में कोई कोर कसर नहीं रखते। 

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