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खुले में सड़ रहे 20 लाख के वूडेन स्लीपर

Gonda Updated Mon, 01 Dec 2014 05:30 AM IST
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गोंडा। कंक्रीट से पहले जिस वूडेन (लकड़ी) स्लीपर लगे रेल ट्रैक से होकर ट्रेनें गुजरती थीं, आज वही वूडेन स्लीपर एक कबाड़ की तरह रेलवे परिसर के खुले में सड़ रहे हैं। हालत यह है कि तकरीबन 20 लाख रुपये की लागत वाले इस स्लीपरों की रेलवे की नजर में कोई अहमियत नहीं रह गई है। इससे रेलवे को राजस्व का नुकसान हो रहा है। रेलवे द्वारा इसकी नीलामी भी नहीं की जा रही है।
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कंक्रीट ने ली वूडेन स्लीपरों की जगह
शुरूआती समय में रेल ट्रैक बिछाने के लिए पहले चीड़ या फिर साखू की लकड़ियों के (वूडेन) स्लीपर तैयार किए जाते थे। इनकी जगह अब कंक्रीट (सीमेंट-सरिया की मिक्सिंग) के स्लीपर ने ले ली। इससे न सिर्फ ट्रेनों की रफ्तार में इजाफा हुआ, बल्कि इससे वन संपदा को होने वाले नुकसान पर भी अंकुश लगा।
16 साल पहले दिया गया था आदेश
देशभर में ट्रैक में प्रयुक्त वूडेन स्लीपरों को बदलने का आदेश रेलवे ने 16 साल पहले वर्ष 1990 में दिया था। जिसके बाद से जहां भी वूडेन स्लीपर लगे हैं। उन्हें बदलकर उसकी जगह कंक्रीट के स्लीपर लगाए जा रहे हैं।
डेढ़ साल से बंद नीलामी
ट्रैक पर बिछे वूडेन स्लीपरों को निकालकर इनकी जगह कंक्रीट के स्लीपर लगाए जा रहे हैं। शुरूआती दौर में जो भी वूडेन स्लीपर निकाले जाते रहे, उनकी रेलवे नीलामी करता रहा। लेकिन इधर बीते डेढ़ वर्षों से इनकी नीलामी पर रेलवे ने नहीं की। जिसका नतीजा है कि गोंडा, करनैलगंज व मनकापुर रेलवे स्टेशन पर ट्रैक से निकाले गए इस तरह के सवा दो सौ टन वूडेन स्लीपरों का ढेर लगा है।
अकेले गोंडा में सड़ रहा 150 टन वूडेन स्लीपर
गोंडा रेलवे स्टेशन स्थित रेलपथ निरीक्षक कार्यालय के ठीक सामने रेलवे की एक बीघा जमीन में करीब डेढ़ सौ टन वूडेन स्लीपरों का ढेर लगा है, जो काफी समय से खुले में सड़ रहे हैं। ठीक इसी तरह जरवल व करनैलगंज में 50 टन व मनकापुर, बुढ़वल में 25 टन वूडेन स्लीपर खुले में पड़े हैं।
12 किलो के एक स्लीपर की 100 रुपये में होती नीलामी
चीड़ और साखू की लकड़ी के बने एक स्लीपर की कीमत वैसे तो वर्तमान में 1000 रुपये से भी अधिक है। लेकिन यह स्लीपर रेलवे में प्रयुक्त हो चुके हैं, इसलिए इनकी नीलामी रेलवे शुरूआती दौर से ही प्रति किलो के रेट से करता आ रहा है। जिसकी वर्तमान में कीमत प्रति किलो सवा 8 रुपये है। इस लिहाज से 12 किलो वजनी एक स्लीपर की कीमत 100 रुपये के आसपास होती है। अलग-अलग रेलवे स्टेशनों पर कबाड़ की तरह पड़े सवा दो सौ टन स्लीपरों की कीमत 20 लाख रुपये के करीब है।
उच्चाधिकारियों द्वारा लगाई गई रोक
उच्चाधिकारियों द्वारा लगाई गई रोक के कारण वूडेन स्लीपरों की नीलामी नहीं हो पा रही है। इस कारण इनका ढेर ठीक मेरे कार्यालय के सामने खाली पड़े मैदान में लगा है। इसके लिए एक चौकीदार की ड्यूटी लगाई गई है, ताकि यह चोरी न हो जाएं।
-राजीव कुमार सिंह, सीनियर सेक्शन इंजीनियर रेल पथ

लकड़ी को ढकवाया जाएगा
वूडेन स्लीपरों का कोई इस्तेमाल रेलवे में नहीं हो रहा है, इसलिए इनकी जितनी जल्दी हो सके नीलामी हो जानी चाहिए। नीलामी प्रक्रिया पर रोक लगी है, जिसे दिखवाकर इसका इंतजाम जल्द किया जाएगा। साथ ही नीलामी के समय तक लकड़ी सुरक्षित रहे, इसके लिए इसे ढकने की भी व्यवस्था की जाएगी।
- मनोज कुमार अग्रवाल, अपर मंडल रेल प्रबंधक

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