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वतन पर मर मिटे, अब पहचान भी हो रही गायब

Gonda Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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गोंडा। ‘यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाया करता है, तो मैं समझता हूं हमारी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। देश को हमारे प्राणों की आवश्यकता है। यह उतना ही स्वाभाविक है जितना प्रात:कालीन सूर्य का उदय होना। मृत्यु क्या है, जीवन की दूसरी दिशा के अलावा कुछ नहीं। इसलिए मनुष्य मृत्यु से दु:ख और भय क्यों माने? यह तो नितांत स्वाभाविक अवस्था है। मैं मरने नहीं वरन् आजाद भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूं।’ इस मार्मिक अभिव्यक्ति के साथ काकोरी कांड के अमर सेनानी राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी ने 17 दिसम्बर 1927 को गोंडा जिला जेल में फांसी का फंदा चूमा था। उनकी स्मृति में बूचड़ घाट स्थित समाधि स्थल पर काफी प्रयास के बाद शहीद स्मारक तो बनवा दिया गया, लेकिन वर्तमान में यहां की दीवार गिर गई है। इसके बाद भी कोई पूछने वाला नहीं है। वहीं राजा देवी बख्श सिंह से जुड़ा स्थल भी अपने दुर्दिन पर आंसू बहा रहा है।
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मेरठ में आजादी की क्रांति फूटने के बाद गोंडा, बहराइच में स्वाधीनता के लिए शुरू हुई जंग सबसे पहले करनैलगंज के सकरौरा छावनी से ही उठी थी, जब भारतीय सैनिकों ने तीन अंग्रेज अधिकारियों को मौत की नींद सुला दिया। सकरौरा छावनी के ही कुछ सिपाहियों ने हिशामपुर तहसील को भी लूट लिया। करनैलगंज में अंग्रेजों ने जो तोपखाना स्थापित किया था, वर्तमान में उसमें कोतवाली चल रही है। यहां पर स्थापित सकरौरा घाट अभी भी स्वाधीनता आंदोलन की याद दिलाता है। हालांकि इसके विकास के लिए दावे तो बहुत किये गये, लेकिन हुआ कुछ नहीं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम अचल आचार्य का कहना है कि सिर्फ जुबानी बयानबाजी ही हो रही है, हकीकत में कुछ नहीं हो रहा है। गोंडा के राजा देबी बख्श सिंह ने आजादी के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को नेतृत्व प्रदान किया। उनके नेतृत्व में हजारों सैनिकों ने बेगम हजरतमहल के सैनिकों का वीरतापूर्वक साथ दिया। जनवरी 1858 तक यह क्षेत्र अंग्रेजी सेनाओं से पूरी तरह मुक्त रहा। अंग्रेज सैनिक अधिकारी राक्राफ्ट के नेतृत्व में जल सेना की एक टुकड़ी 5 मार्च 1858 को बेलवा पहुंची। गोंडा के राजा देबी बख्श सिंह, मेंहदी हसन, चरदा के राजा के नेतृत्व में 14 हजार स्वतंत्र सैनिकों ने अंग्रेजी सेना पर हमला कर दिया। भारी संख्या में सैनिकों के हताहत होेने के कारण राजा देबी बख्श सिंह को युद्ध बंद करना पड़ा। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अंत तक गोंडा नरेश देबी बख्श सिंह अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे। बाद में राजा देबी बख्श सिंह नेपाल के घने जंगलों में चले गये, जहां उनकी मलेरिया से मृत्यु हो गयी। मुख्यालय पर राजा देबी बख्श सिंह के नाम पर पुस्तकालय है, जहां पर उनकी प्रतिमा लगी हुई है, लेकिन इस प्रतिमा पर आज तक छाजन की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। उनकी याद में जिगना कोट में स्थापित ऐतिहासिक स्थल भी संरक्षण के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। राजा देबी बख्श सिंह स्मारक समिति के महामंत्री धर्मवीर आर्य ने ऐतिहासिक स्थलों के विकास की मांग की है। उधर, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रविचन्द्र त्रिपाठी ने लाहिड़ी शहीद स्थल की तत्काल मरम्मत कराने की मांग की है।

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