हे भगवान! अक्तूबर में गंगा का ये हाल

Ghazipur Updated Sun, 28 Oct 2012 12:00 PM IST
गाजीपुर। पतित पावनी गंगा में जहां पहले अक्तूबर माह में पानी लबालब रहता था। वहीं इस समय गंगा सूख गई हैं। घाट छोड़कर गंगा इतनी दूर चली गईं हैं कि भक्तों को स्नान के लिए काफी दूर जाकर पसीना बहाना पड़ रहा है। हल्की हवा के झोंके से गंगा के रेत से धूल का गुबार उड़ रहा है। इलाकाई लोगों का कहना है कि आज तक गंगा का ऐसा हाल कभी नहीं हुआ था।
गंगा हमेशा अथाह पानी की गवाह रहीं हैं। एक छोर से दूसरे छोर का पानी साफ नजर नहीं आता था। कुछ ही दिन पूर्व गंगा का जल स्तर बढ़ने से जिले के मुहम्मदाबाद और करंडा में तबाही मचनी शुरू हुई। कितनों को घर उजाड़ना पड़ा तो कितनों की बेशकीमती भूमि गंगा में विलीन हो गई। वहीं इस समय गंगा का पाट किसी छोटी नदी से भी कम नजर आ रही है। अक्तूबर के माह में ही गंगा की इस दशा पर धार्मिक तथा धर्म कार्यों से जुड़े लोग गहरी चिंता जताने को मजबूर हो गए हैं। उनका मानना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाली गरमी में गंगा कादर्शन भी दुर्लभ हो जाएगा। गंगा के किनारे की जाने वाली सूर्योपासना का पर्व डाला छठ नजदीक है। ऐसे में मां गंगा तक जाने के लिए श्रद्धालुओं को काफी पैदल चलना पड़ सकता है।
शहर के महादेवाघाट ददरीघाट आदि घाटों से गंगा की दूरी बहुत बढ़ गई। गंगा के इस बदले स्वरूप को देख कर भक्तों में काफी निराशा व्याप्त है। पंडित अचलानंद उपाध्याय के मुताबिक कलिकाल के लिए गंगा वरदान हैं। इस माह में गंगा चारों तरफ फैली रहती हैं। क्वार और कार्तिक में गंगा की यह दशा कतई नहीं होनी चाहिए। धर्म से जुड़े संस्कार गंगा पर ही निर्भर करते हैं। पंडित प्रदीप चौबे का कहना है कि मां गंगा की इस दशा के लिए पूरी तरह से मानव ही जिम्मेदार है। इन्हें बचाने के लिए सरकारी कवायद के अलावा हमें भी जागरुरक होना चाहिए। बताया कि माता गंगा के लगातार सिमटने को भविष्य में होने वाली अनहोनी के संकेत के रुप में भी माना जा सकता है। गंगा गरमी में सिमटती है जबकि इस समय इनका रुप विस्तार वाला होना चाहिए।

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