पावरकट से बुनकरों को रोटी के लाले

Ghazipur Updated Mon, 27 Aug 2012 12:00 PM IST
जंगीपुर। देश-विदेश में कभी अपनी कारीगरी का परचम लहराने वाले बुनकरों की दशा बेहद दयनीय हो गई है। दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी यहां के बुनकर परिवार के लिए दो जून की रोटी नहीं जुटा पाते। सरकारों ने भी बुनकरों के साथ कोरा आश्वासन दे कर खूब छलावा किया। नगर में पहले कुल 83 पावरलूम थे जो धीरे- धीरे बंद होते चले गए। हालत यह है कि आज मात्र 21 पावरलूम चल रहे हैं, जिसमें काम कर रहे बुनकर खून के आंसू रो रहे हैं।
करीब 20 हजार की आबादी वाले जंगीपुर टाउनएरिया के छह वार्डों में हजारों बुनकरों का बसेरा है। कुशल कारीगरों द्वारा ताने-बाने पर बुनीं गईं यहां की साड़ियां दिल्ली, बंगलूरू, कोलकाता, पंजाब आदि राज्यों सहित विदेशों में भी भेजी जाती रहीं हैं लेकिन पावरकट और उपेक्षा के चलते आज यहां सिर्फ 21 पावरलूम तथा 110 हैंडलूम ही रह गए हैं।
करीब तीन दशक से बुनकरों की समस्या में कोई सुधार नहीं हुआ है। पूर्ववर्ती कई सरकारों ने इनके विकास के लिए कई वायदे किए लेकिन सब छलावा साबित हो गया। आज इनके पास रोटी के भी लाले पड़ गए हैं। एक पावरलूम को लगाने में लगभग 60 हजार रुपये लगता है। अपनी जमीन नहीं होने के कारण इनकों बैंक से लोन भी नहीं मिलता। सूद पर पैसा लेकर पावरलूम लगाने वाले बुनकर बाद में उसे बेचने को मजबूर हो गए। धागे की महंगाई और अन्य समस्याओं के चलते अपनी पुश्तैनी धंधे छोड़कर बुनकर मजदूरी की ओर रुख कर रहे हैं।

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