हालात से जंग लड़ रहा क्रांतिवीर परिवार

Ghazipur Updated Mon, 06 Aug 2012 12:00 PM IST
जखनिया। रहने को घर नहीं, सोने को विस्तर नहीं, अपना तो खुदा है रखवाला, अब तक उसी ने है पाला..। फिल्म सड़क का यह गीत मौजूदा समय में महावीर चक्र विजेता रामउग्रह पांडेय की विधवा पत्नी पर सटीक बैठता है। देश की आन, बान और शान के लिए जिसने अंग्रेजो से लोहा लिया। हंस-हंस कर अपने जान की कुर्बानी दे दी। आज उन्हीं की विधवा पत्नी सिर छुपाने, बीमारी का इलाज कराने तथा दाने-दाने को मजबूर हैं। बेबसी और लाचारी के बावजूद उनकी गुहार नक्कारखाने में तूती की तरह बोल रही है।
इसलिए मिला था महावीर चक्र सम्मान
पहली जुलाई 1942 को जखनिया के एमावंशी गांव में एचएन पांडेय के घर जन्मे रामउग्रह पांडेय ने 31 दिसंबर 1962 को सेना में भरती हुए थे। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध में लांस नायक रामउग्रह पांडेय ने अदम्य शौर्य एवं वीरता का प्रदर्शन करते हुए पाक सेना तीन बंकरों को तबाह कर दुश्मन की कमर तोड़कर रख दी थी। बताया जाता है कि आग उगलते पाकिस्तानी बंकरों को तबाह करने के लिए वह खुद लांचर लेकर बंकर में घुस गए थे और दुश्मनों की कमर तोड़कर कर रख दी थी।
इस दौरान 24 नवंबर 1971 को वह वीर गति को प्राप्त हो गए। इसके लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें सेना का दूसरा सबसे बड़ा महावीर चक्र सम्मान दिया गया। इससे पूरे देश को गर्व हुआ।
मेरा दर्द न जाने कोय
जिस समय रामउग्रह पांडेय वीर गति को प्राप्त हुए थे, उस समय उनकी पत्नी श्यामा देवी महज 20 वर्ष की ही थीं। उनकी गोद में एकमात्र डेढ़ वर्ष की पुत्री सुनीता थी। आजादी के इतने वर्ष बीत गए लेकिन इस मां-बेटी की सुधि लेने वाला अब कोई नहीं है। हालात से शहीद की यह विधवा ऐसी जंग लड़ रही है, जिसकी व्यथा-कथा सुनकर पत्थर दिल भी पसीजने को मजबूर होगा। बकौल श्यामा देवी उनका बांया फेफड़ा खराब हो चुका है। इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। पुराना मकान खंडहर हो चुका है। फफकते हुए कहा कि परिजनों को सरकारी सुविधा के बाबत विभाग की ओर से कहा जाता है कि शहीद की पुत्री की मदद नहीं की जाती। करीब 27 वर्ष बाद वर्ष 1998-99 में गांव में उनकी ही पैतृक जमीन में शहीद स्मारक एवं पार्क का निर्माण तत्कालीन डीएम ने करवाया। वर्ष 2000 को शहीद की मूर्ति भी लगवाई गई लेकिन भूमि का मुआवजा आज तक नहीं मिला। वह बताती हैं कि पिछले दो वर्ष से पेंशन की धनराशि बढ़ गई है, लेकिन अभी तक पुरानी पेंशन ही मिल रही है। बढ़ी पेंशन के लिए वह सेंटर कामथी नागपुर महाराष्ट्र ब्रिगेड आफ द गार्ड यूनिट अजमेर से लगायत ट्रेजरी आफिस गाजीपुर तक का चक्कर लगा चुकी हैं। जहां से सभी पेपर जखनिया स्थित बैंक भेज दिए जाने की बात कही जाती है, जबकि यूबीआई की तरफ से रोज आज-कल का वादा कर उनको टाल दिया जाता है। लिहाजा बेबसी और लाचारी के बीच जूझ रही महावीर चक्र विजेता की पत्नी को अब जिंदगी बोझ लगने लगी है।

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