ठुकराए बागबां

Ghaziabad Updated Thu, 30 Aug 2012 12:00 PM IST
दिल में है दर्द लबों पर दुआ
औलाद पर कानून के चाबुक से बहुत सहमत नहीं सताए बुजुर्
गाजियाबाद। उम्र के अंतिम पड़ाव से अपनों से दूर रहने का दर्द वही बागबां जान सकते हैं, जिन पर ऐसी बीत रही है। अखिलेश सरकार के फैसले ने जिले के ऐसे सैकड़ों बुजुर्गों की आंखों में फिर से चमक ला दी है। यूपी के सरकार के नए फैसले पर ‘अमर उजाला’ ने ऐसे बुजुर्गों के दुख-दर्द बांटे तो आंसुओं के सहारे पीड़ा का समंदर फूटता दिखा। औलाद के सताए ज्यादातर बुजुर्ग न तो अपनों पर कानून का चाबुक देखना चाहते हैं और न कोई बद्दुआ देते हैं। अपने घर-परिवार में सम्मान से रहना जरूर चाहते हैं। बेघर किए गए कुछ बुजुर्ग ऐसे भी सामने आए, जो रिश्तों का फर्ज निभाने की जगह बड़े-बुजुर्गों पर जुल्म करने वाली संतानों को नए कानून के जरिए सबक सिखाने के मूड में हैं।
अपनों से मिलने को मचलता है दिल
शहर के एक वृद्ध दंपति की कहानी जानिए, जो बेटों-बहुओं और पोता-पोती का भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद वह आश्रम में रहने को मजबूर हैं। अमर उजाला ने पूछा तो उन्होंने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। इतना जरूर कहा कि हम जैसे भी हंै, जहां भी है, अपनी इसी दुनिया में खुश हैं। हालात से समझौता कर लिया है। कभी अपने जिगर के टुकड़ों को एक नजर देखने का जी करता है तो खुद जाकर उनसे मिल आते हैं। उनके साथ वाले बाकी लोगों का कहना यह बुजुर्ग जोड़ा कभी किसी से शिकायत नहीं करता। उन्हें शायद डर है कि मुंह खोला तो कभी-कभी बेटे के घर आना-जाना भी कहीं बंद न हो जाए।
उम्र के आखिरी पड़ाव में वृद्धाश्रम बना ठिकाना
कई साल से प्रताप विहार वृद्धाश्रम में रह रहे जोगेंद्र पाल की पीड़ा किसी को भी रुला सकती है। रेलवे में सीनियर लोको इंस्पेक्टर पद से रिटायर जोगेंद्र बताते हैं कि 1981 में पत्नी की मौत के बाद इकलौते बेटे को मां की तरह पाला। यहां मकान बनाया मगर शादी के बाद उनके सपने टूट गए। बच्चों ने उन्हें पूरा सम्‍मान नहीं दिया। सालों तक वह हालात से समझौता करते रहे मगर आखिर में वे हार गए। उन्होंने दुखी मन से परिवार को छोड़ने का फैसला किया। जिंदगी के आखिरी पड़ाव में वे वृद्धाआश्रम में जैसे तैसे जी रहे हैं। दिल इतना टूट चुका है कि डीएम को लिखित में पत्र लिखकर इकलौते बेटे सेे मुखाग्नि का अधिकार तक छीन लिया है। बहुत मांगने पर भी उन्होंने हमें अपने बेटे का मोबाइल नंबर और पता नहीं बताया। हो सकता है उनसे बात करने पर बेटे का पक्ष भी मजबूत जान पड़ता। नेहरूनगर के एक बुजुर्ग की कहानी भी कुछ ऐसी है, जिनके मकान पर बेटों ने कब्जा कर लिया है। सब कुछ होते हुए भी परिवारों से दूर हुए ऐसे और भी बुजुर्ग मिले मगर औलाद की इज्जत की खातिर ज्यादातर ने कुछ भी नहीं बताया। इशारों में यह जरूर कहा कि जिन हाथों से बच्चों को कामयाबी की राह दिखाई, उन्हें सजा कैसे दिला सकते हैं! रही बात अपने कष्टों की, चार दिन की जिंदगी यूं ही काट लेंगे। यूं ही मौन रहकर..। समाज के विभिन्न वर्गों से बातचीत में एक सुर से यह आवाज जरूर है कि यूपी सरकार का नया फैसला बुजुर्गों को उनके परिवारों में जगह और सम्मान दोनों दिलाएगा।
रोज दुखड़ा सुनाने आते हैं बुजुर्ग: एसएसपी
एसएसपी प्रशांत कुमार बताते हैं कि उनकेपास हर महीने 40 या इससे भी ज्यादा बुजुर्ग अपनी औलाद के जुल्म की शिकायत लेकर आते हैं। हालांकि, ज्यादातर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ ये चाहते हैं कि पुलिस डांट-डपटकर उनके बेटों को फर्ज की राह पर ला दे। वैसे भी पुलिस पुलिस इस तरह केमामलों में कोई गंभीर कार्रवाई नहीं कर सकती।

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