मि. गुप्ता के हौसले को सलाम

Ghaziabad Updated Wed, 18 Jul 2012 12:00 PM IST
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जीडीए और जल निगम के खिलाफ लड़ी लंबी लड़ाई और पाया इंसाफ
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गाजियाबाद। दिन, महीने और साल नहीं ये कहानी 30 बरस के ऐसे संघर्ष की है, जिसमें गुप्ता दंपति ने क्या कुछ नहीं खोया। भागते-भागते बीएन गुप्ता पर जवानी से बुढ़ापा आ गया। नौकरी से रिटायर हो गए। खून-पसीने से कमाए लाखों रुपये कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते हुए खर्च हो गए। बूढ़े शरीर पर यह बोझ क्या कम था, जो उन पर दुश्मन कैंसर ने और हमला बोल दिया। वक्त और हालात ने उन्हें परेशान तो किया मगर उन्होंने हार नहीं मानी। नतीजा सामने है। गुप्ताजी जीत गए हैं। हाईकोर्ट के फैसले से उनके चेहरे पर हंसी छा गई है।
राजनगर के रहने वाले बीएन गुप्ता जैन हायर सेकेंड्री स्कूल, शाहदरा में क्लर्क के पद पर भर्ती हुए थे और प्रिंसिपल के रूप में रिटायर हुए हैं। 1995 में राज्य शिक्षक पुरस्कार हासिल कर चुके हैं। पत्नी जगवती गुप्ता के नाम उन्होंने 1979 में मकान क्या खरीदा, उसके बाद उनकी जिंदगी जैसे कोर्ट-कचहरी के ही नाम हो गई। गड़बड़ी जीडीए और जल निगम की थी और खामियाजा गुप्ता को भुगतना पड़ा। प्राधिकरण और जल निगम के खिलाफ उन्होंने पहली बार 1982 में आवाज उठाई थी और वह लड़ाई अभी 2012 तक जारी रही। दफ्तरों के बहुत चक्कर लगाने के बाद भी जब इंसाफ नहीं मिला तो उन्होंने 1999 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली।
मिस्टर गुप्ता बताते हैं कि 1961 में दिल्ली और आसपास सीवर लाइन बिछाने के दौरान लोकल सेल्फ विभाग को इंप्रूवमेंट ट्रस्ट ने ग्रीन बेल्ट पर अस्थाई निर्माण की इजाजत दी थी। पांच जुलाई 1973 को निगम ने जमीन को अलॉट करने के लिए कमिश्नर के आवेदन किया। कमिश्नर ने मुख्य नगर ग्राम नियोजक की अनुमति के बाद ऐसा करने को कहा। ग्रीन बेल्ट बेचने से विकास अवरुद्ध होने की बात पर अनुमति निरस्त हो गई। इस पर जीडीए ने निगम को पांच साल की लीज पर जमीन दे दी। 1974 में जीडीए ने गलत तरीके से मास्टर प्लान फेरबदल कर प्लाटों का एरिया घटा- बढ़ा दिया। गुप्ता के मुताबिक, पत्नी के नाम उन्होंने 793.33 वर्गमीटर का प्लाट रीसेल में खरीदा था। उनके प्लाट आर-13 का क्षेत्रफल 33.29 वर्गमीटर घटाकर आर-14 में शामिल कर दिया गया। घर के सामने 60 फुट की रोड थी, जिसे निगम ने दीवार उठाकर बंद कर दिया। जीडीए ने घर के नीचे से नाला और निकाल दिया। 10 फरवरी 1982 को जीडीए बोर्ड बैठक में उत्तर प्रदेश मुख्य नगर ग्राम नियोजक ने जांच के बाद निगम को ग्रीन बेल्ट की 21,194 वर्गमीटर जमीन पर बनी वर्कशॉप और गोडाउन को तुरंत खाली करने के साथ 20,270 वर्गमीटर क्षेत्रफल में बने कम लागत के मकानों को ग्रीन बेल्ट में बदलने का आदेश दिया था। 24816 वर्गमीटर जमीन निगम को बेचने का फैसला हुआ। 1985 में जीडीए ने अवैध रूप से मास्टर में बदलाव करते हुए पूरी ग्रीन बेल्ट पर जल निगम का कब्जा दर्शा दिया। 16 मार्च 1989 को निगम के पक्ष में रजिस्ट्री की गई। रजिस्ट्री में 1984 के स्टांप का इस्तेमाल हुआ। जबकि नियमानुसार स्टांप सिर्फ छह माह तक ही वैध रहते हैं। बीएन गुप्ता कहते हैं कि निगम ने 2200 वर्गमीटर अतिरिक्त जमीन घेर रखी है, जिसको हटाने के लिए जीडीए ने आदेश जारी कर रखे हैं। हाईकोर्ट ने तीन माह में जीडीए को रिपोर्ट देने के आदेश दिए हैं।


‘न्याय अभी जिंदा है’
हाईकोर्ट के फैसले पर खुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि देश में न्याय अभी जिंदा है। तीन दशक के संघर्ष के बाद उन्हें जिस तरह से जीत मिली है, यह उनके जैसे दूसरे लोगों में भी लड़ने का हौसला पैदा करेगी।
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