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गोलू की गोली न बिट्टू का बाजा

Ghaziabad Updated Fri, 22 Jun 2012 12:00 PM IST
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सुपरकिड के चक्कर में बच्चे हुए ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ का शिकार
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गाजियाबाद(ब्यूरो)। न कंचे और न बाजा। न दादी-नानी की कहानियां, न परियों की बातें और न ही हंसी ठिठोली। शरारत तो दूर बचपन की चहचहाहट भी नहीं। बस बात हो रही है तो सिर्फ ‘सुपरकिड’ यानी आल इन वन की। माता-पिता की महत्वाकांक्षा ने नन्हे शहजादों से उनकी अपनी यूनीक आइडेंटिटी ही छीन ली है। वह दुविधा में हैं और इसी कारण समय से पहले ही उनमें बड़ों जैसा स्वभाव पनपने लगता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि परिजनों की इच्छाओं के बीच बच्चों की अपनी पहचान ही खत्म होती जा रही है। तनाव, गंभीरता और जिम्मेदारी उठाने का अहसास उनमें बड़ों जैसा ही दिखने लगता है। यह सब उनके मानसिक विकास पर बेहद बुरा असर डाल रहा है।
पढ़ाई, गीत-संगीत और बेहतरीन स्टेज परफॉर्मर अर्णव खेलने में फिसड्डी था। 13 साल की छोटी सी उम्र में मम्मी-पापा ने उसे खेल अकादमी में भेजना शुरू कर दिया। वहां उसे एक्सट्रा मेहनत करनी पड़ी। खेल में तो वह बेहतर परफॉर्म करने लगा लेकिन अपनी दूसरी स्किल्स को लेकर वह कन्फयूज हो गया। दोनों ही ओर वह अपना सौ प्रतिशत नहीं दे पाया। इससे वह तनाव का शिकार हो गया।
रियलिटी शो देखकर अर्श के माता-पिता ने उसे भी डांसर बनाने के लिए डांस क्लास भेजना शुरू कर दिया। स्पोर्ट्स और पढ़ाई में अव्वल रहने वाला अर्श गाना भी अच्छा गाता था। लेकिन डांस क्लास में जाने के बाद वह पढ़ाई में पिछड़ने लगा तो मम्मी पापा ने डांटा। वह गुुमसुम और गंभीर रहने लगा।

ऐसे दबाव से बच्चों में चिड़चिड़ापन, जिद्दीपन और परफार्मेंस खराब होने की शिकायतें आने लगी है। बच्चों में आइडेंटिटी क्राइसिस का खतरा बढ़ा गया है। यह बाद में चलकर बहुत ही घातक साबित होता है।
- संजय त्यागी, मनोविज्ञानी
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