झील, तालाब और सड़क, सब बेच डाले बेधड़क

Ghaziabad Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
अर्थला में नहर पर ही बस गया शहर, घोटालों पर घोटाले पर अफसरों के मुंह पर ताले
गाजियाबाद। देखिए माफियाराज। अफसरों के साथ मिलकर ऐसा खेल किया कि करोड़ों के वारे-न्यारे कर डाले। करीब 1500 करोड़ की सरकारी जमीन की क्वालिटी बदलकर फर्जी प्रविष्टियां दर्ज कर बिल्डरों को बेच दीं। रिकार्ड में दर्ज झील, पोखर, सड़क, नहर, जोहड़ , ऊसर और बंजर जमीन के खातों में मनमानी की गई। महानगर के अर्थला में बंजर और नहर रिकार्ड वाली जमीन पर भी कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए। एनसीआर में जमीन की ऐसी बूम आई कि माफिया को जहां जगह मिली कब्जा ली। अर्थला में माफिया से मिले अफसरों ने सरकारी जमीनें हथियाकर बेच डालीं। पहले 25 खसरा नंबरों वाली 125 एकड़ जमीन को कुछ खास लोगों के नाम किया, फिर बेच दिया। 1996 में हुए इस खेल का खुलासा 19 मई 2005 को हुई तहसीलदार की जांच रिपोर्ट में हुआ, लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं हुई। अनुमान है कि यह घोटाला 1500 करोड़ रुपये का है।


ये हैं जमीनें
खसरा नंबर 1456, 45, 44, 22, 948, औरा 842 पर झील, 1455 पर नहर, 1454 पर सड़क, 1063 पर जोहड़, 1054 पर ऊसर दर्ज है। जबकि अन्य 15 नंबरों पर बंजर-परती जमीन दर्ज है। हैरानी की बात तो यह है कि निगम अफसर चाहकर भी इसे कब्जा मुक्त कराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

जमींदारी व्यवस्‍था खत्म होने का माफिया ने उठाया फायदा
शासन ने 1991 में जमींदारी व्यवस्था को खत्म किया था। इससे फसली खेती अधिनियम की धारा 117 के तहत बंजर जमीन ऐसे लोगों के नाम कर दी गई थी, जिनका उस पर पट्टा कब्जा था। इसका सहारा लेकर सरकारी जमीन में खेल किया, लेकिन घपला आखिर घपला है। नियमानुसार एक नाम पर एक ही नंबर का पट्टा हो सकता है, जबकि बंजर जमीन के ज्यादातर नंबर एक ही नाम पर चढ़ा दिए गए हैं। दूसरी बात यह है कि झील, तालाब, पोखर, सड़क और नहर की जमीन किसी के नाम हो ही नहीं सकती जबकि माफिया ने इसको भी बेच करा लिया। नहर किनारे की जमीन सहित तालाबों-पोखरों को पाटकर भवन खड़े कर दिए गए।


नगर आयुक्त रह गए भौचक्के
मामला गंभीर है। चीफ इंजीनियर से दिखवाया जा रहा है। निगम की जमीन को कब्जा मुक्त कराया जाएगा। जमीन के सभी कागजात रिकार्ड का अवलोकन अधिकारी कर रहे हैं। जिन अफसरों केकार्यकाल में लापरवाही हुई, उनकी भी जांच कराई जाएगी।
जितेन्द्र सिंह, नगर आयुक्त।

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