पुलिसकर्मियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा

Ghaziabad Updated Thu, 14 Jun 2012 12:00 PM IST
गाजियाबाद। पुलिस कस्टडी में हुई विनायक की मौत ने विजयनगर थाने में बवाल करा दिया। गुस्साई भीड़ ने पुलिसवालों को दौड़ा दौड़कर पीटा। पुलिसकर्मी पब्लिक से बचने के लिए जगह ढूंढते दिखे। एक आरोपी पुलिसकर्मी का सिर भी फोड़ दिया। बवाल की सूचना पर सिहानी गेट, कविनगर और कोतवाली प्रभारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और
लोगों पर लाठीचार्ज कर दिया। इससे लोग और भड़क गए। बाद में सीओ प्रथम, सीओ सेकेंड, एसपी ग्रामीण और सिटी मजिस्ट्रेट के समझाने पर ही वे शांत हुए। एहतियातन विजयनगर थाने पर अतिरिक्त पुलिस-पीएसी बल तैनात कर दिया गया है।
विनायक की मौत की खबर सुबह करीब 8 बजे परिजनों को मिली। वे तत्काल सैकड़ों लोगाें के साथ थाने जा पहुंचे। उधर, नोएडा के कैलाश अस्पताल से विनायक की लाश को लेकर अन्य परिजन भी थाने पहुंच गए। गुस्साए लोगों ने लाश को सड़क पर रखकर एनएच-24 जाम करने का ऐलान किया तो पुलिस के होश उड़ गए। पुलिस ने छीना झपटी कर लाश को अपने कब्जे में ले लिया और पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया। तभी लोगों को सिपाही शैलजाकांत दिख गया, जो विनायक को उठाकर लाया था। बस लोग उस पर टूट पड़े। भागते हुए सिपाही को जिसने भ्ज्ञी बचाने की कोशिश की वही पब्लिक से पिटा। इसी बीच सिपाही एसएचओ के आवास में जा घुसा और अंदर से कुंडी लगा ली। भीड़ दीवार कूदकर अंदर जा पहुंची और सिपाही की पिटाई करनी शुरू कर दी। किसी प्रकार पुलिसकर्मियों ने सिपाही को पिछले रास्ते से बाहर निकाला। पिटाई से शैलजाकांत का सिर भी फूट गया।


पोस्टमार्टम रिपोर्ट से उलझा मौत का राज
विनायक की मौत का मामला पोस्टमार्टम रिपोर्ट से उलझ गया है। पीएम रिपोर्ट पुलिस के दावों की चुगली कर रही है। दोपहर को डाक्टरों के पैनल से विनायक की लाश का पोस्टमार्टम कराया गया। पुलिस का कहना था कि संभवत: हार्ट अटैक के कारण मौत हुई। जबकि सूत्र बताते हैं कि विनायक के पेट से कुछ जहरीला पदार्थ थी मिला है। फिलहाल डाक्टरों ने विनायक का दिल, दिमाग और विसरा प्रिजर्व कर लिया है।

पति और पत्नी दोनों के थे वारंट
विनायक और उसकी पत्नी कमलेश के खिलाफ वर्ष 2008 में मारपीट और गाली गलौज आदि के तहत दर्ज हुए मामले की सुनवाई कोर्ट में चल रही थी। पुलिस की माने तो पिछली कई तारीखों पर यह दंपति कोर्ट में पेश नहीं हो रहे थे। उनके 5-5 हजार रुपये के बेलेबल वारंट जारी हुए थे। कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया था कि 14 जून से पहले वारंटियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जाए।

घर पर ही दी जा सकती थी बेल
पुलिस अगर चाहती तो विनायक की जान बच सकती थी। कानून के जानकारों का कहना है कि बेलेबल वारंट में आरोपी का यह अधिकार होता है कि वह घर पर ही जमानती पेश करके जमानत हासिल कर ले। अधिवक्ता खालिद खान का कहना है कि अगर कोई जमानती नहीं मिलता है, तब भी आरोपी खुद पर्सनल बांड पर बेल हासिल कर सकने का अधिकार रखता है।
क्या कहते हैं एसएसपी
पुलिसवालों को बीमार व्यक्ति को लाने नहीं चाहिए था। फिर उसे तबियत खराब होने पर छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। उसे अस्पताल पहुंचाया जाना चाहिए था। लेकिन पुलिसवालों ने ऐसा नहीं किया। आरापियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस के लिए ‘गुनाह’ नहीं मानवाधिकार का उल्लंघन

गाजियाबाद। पुलिस के लिए मानवाधिकार का उल्लंघन ‘गुनाह’ नहीं। आयोग भले ही इसे गंभीर माने, मगर ज्यादातर पुलिसवाले इसे हल्के में ही लेते हैं। यही वजह है कि ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं।
जनपद में पुलिस हिरासत में मौत का पहला मामला रामकिशोर का था। उसकी मौत 23 जुलाई 1993 को हुई थी। झूठी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पुलिस यातना की बात झुठलाने और साक्ष्य मिटाने आदि शिकायतों पर आयोग की तरफ से रिपोर्ट मांगी गई थी। 3 अक्तूबर 1997 को आयोग को बताया गया कि मोदीनगर के एएसपी को दुर्व्यवहार, साक्ष्य नष्ट करने, मामले की लीपापोती का दोषी पाया। 25 जनवरी 2001 को आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार को कारण बताओ नोटिस भेजा था। एक अन्य मामला पिलखुवा के छिजारसी गांव का है। 11 जुलाई 2001 को खेत पर काम कर रहे 70 साल के होशियार सिंह प्रजापति को छिजारसी चौकी पर तैनात पुलिसवाले उठाकर ले गए। पुलिस चौकी पर होशियार को खूब पीटा गया। बाद में पैसे लेकर छोड़ा गया।
5 साल में नपे 283 पुलिसवाले
पिछले पांच सालों में 283 पुलिसवालों को मानवाधिकारों का प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर कार्रवाई हुई। इनमें 18 एसपी स्तर के अफसर भी शामिल हैं। जबकि सबसे ज्यादा तादाद सब-इंस्पेक्टरों की है।


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