अस्पताल और खाकी के गलियारे में मानवाधिकार के मायने नहीं

Firozabad Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
फीरोजाबाद। खाकी के गलियारे में मानवाधिकार के कोई मायने नहीं हैं। थानों में मानवाधिकारों के नियमों के बोर्ड जरूर लगे हैं लेकिन इन पर अमल नहीं होता। मानवाधिकार का पालन खूंटी पर टंगा दिखाई देता है। जनपद में कई एक मामले ऐसे हैं जिनमें पुलिस ने कानून की सीमाएं तोड़ते हुए मानवाधिकार का मखौल उड़ाया है। स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर भी दर्दनाक है। उपचार के नाम पर मानवता के कोई मायने नहीं रह गए हैं।

मानवता भूले धरती के भगवान
फीरोजाबाद। बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मानवाधिकार का अंग हैं। डाक्टर को धरती का भगवान कहा जाता है। उनसे मानवता की अपेक्षा की जाती है लेकिन सरकारी अस्पतालों में मानवता तार-तार होते दिखती है। ताजा मामला जिला अस्पताल के वार्ड नं. में भरती एक मरीज का है। सात दिन से उपचार के नाम पर दुर्गति के शिकार इस मरीज का मामला रविवार को अमर उजाला ने जब उठाया तब अस्पताल प्रशासन ने शर्म महसूस की और रविवार को मरीज की मैली, गंदी चादर बदली गई। जिस अमानवीय ढंग से उसके हाथ-पैर बांध रखे थे उन्हें खोला गया। वहीं 30 नवंबर की शाम को थाना एका क्षेत्र में गर्भवती उपचार के लिए करीब छह घंटे तक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एका पर तड़पती रही, लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं था। पीड़ित परिजनों ने तोड़फोड़ तक कर दी।

पुलिस के लिए खूंटी पर टंगा है मानवाधिकार
अमर उजाला ब्यूरो
फीरोजाबाद। खाकी का भी मानवाधिकार से कोई सरोकार नहीं रहा है। अपराधियों पर थर्ड डिग्री का खाकी खूब प्रयोग करती है। हाल ही में जुल्म कबूलवाने के लिए पुलिस ने एक आरोपी को इतना पीटा कि जेल जाते ही उसकी मौत हो गई। अपराधी जीशान की हत्या का आरोप पुलिस कर्मियों पर लगाया गया। शुक्रवार को सिरसागंज क्षेत्र में कोबरा के दो सिपाहियों ने एक वृद्ध लकड़ी विक्रेता को जमकर पीटा और मानवाधिकार का खुला मजाक उड़ाया। सितंबर के द्वितीय सप्ताह में कानपुर में सड़क हादसे में मारी गई दो आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों के शव फीरोजाबाद आए तो परिजनों ने शवों को हाईवे पर रखकर जाम लगा दिया। इस दौरान महिलाएं पर पुलिस ने लाठियां भांजी, कुछ सिपाहियों ने तो महिलाओं में लात तक मारी। ऐसे एक दो नहीं दर्जनों मामले हैं जिनमें पुलिस ने हद दर्जे की बदसलूकी की।

पुलिस के लिए है नियम
किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी से पूर्व उसको गिरफ्तारी का कारण बताना होगा। पूछताछ के लिए थाने बुलाए गए व्यक्ति को आने जाने का खर्च देना होगा। न्यायालय के आदेश के बाद ही आरोपी के हथकड़ी लगाई जाए। इसके साथ ही अन्य नियम हैं। थाने आए पीड़ित से प्रार्थना पत्र लेकर कानूनी कार्यवाई करते हुए न्याय दिया जाए। इसके साथ अन्य नियम भी शामिल हैं।

एक भी मामला नहीं हुआ दर्ज
मानवाधिकार कानून के तहत पुलिस लाइन में एंटी ह्यूमन ट्रेफिकिंग यूनिट का गठन सितंबर माह में किया गया था। तब से एक भी मामला यहां पर दर्ज नहीं हुआ है। इस यूनिट के बारे में अधिकांश लोगों को जानकारी तक नहीं है। इसमें जबरन किसी से कार्य कराना, घरेलू हिंसा, महिला या युवती को बंधक बनाकर देह व्यापार करना, जैसे मामले दर्ज कराए जा सकते हैं। इन मुकदमों में थानों से कोई लेना देना नहीं होता।

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