दोस्ती छोड़ कर देश को लगाया था गले

Fatehpur Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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फतेहपुर। दोस्ती अहम् है लेकिन उससे भी खास है देश। देश के लिए दोस्ती और खुद को कुर्बान करने का जज्बा दिखाया था बाबा गयादीन दुबे ने। 1857 में भड़की क्रांति की ज्वाला में क्रांतिकारी जब मौत बनकर अंग्रेज अफसरों पर बरस रहे थे तब अपने मित्र बाबा गयादीन दुबे के कोरांई गांव स्थित घर पहुंचकर तत्कालीन जिला जज मिस्टर टक्कर ने सहायता मांगी थी। बाबा ने मदद का भरोसा दिलाया और जिला जज को सुरक्षित उनके आवास भिजवाया। लेकिन उन्होंने जब देखा सामने क्रांतिकारियों की फौज है तो वह दोस्ती निभाने के बजाय देश की हिफाजत के लिए उठ खड़े हुए। ऐसे में जिला जज को खुदकुशी करनी पड़ी।
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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के तमाम नायक हैं। इनमें बाबा गयादीन दुबे को भुलाया नहीं जा सकता। बाबा गयादीन दुबे कोरांई गांव के जमींदार थे। उनके पास 62 गांव थे। बहेलियों की 200 सिपाहियों की बहुत बढ़िया सेना थी। उनकी तत्कालीन जिला जज मिस्टर टक्कर से घनिष्ठ मित्रता थी। खागा में कब्जा करने के बाद क्रांतिकारी फतेहपुर आ चुके थे। नौ जून को जिले में कब्जे के लिए संघर्ष शुरू हो चुका था। कलक्टर जी एडमस्टन अवकाश पर थे। जिले के सभी अफसर जिनमें कार्यवाहक कलेक्टर जेडब्लू शेरर (मैरिज आफिसर) भी शामिल थे, यमुना पार कर बांदा के लिए निकल चुके थे। मिस्टर टक्कर की पत्नी आगरा में थी इसलिए वह यहां रुकने को मजबूर थे।
आठ जून 1857 को दरियाव सिंह के पुत्र सुजान सिंह और अनुज निर्मल सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी खागा पर आधिपत्य जमा चुके थे। उन्होंने नौ जून को फतेहपुर पर भी हमला बोल दिया था। नौ जून की शाम जिला जज टक्कर अपने मित्र बाबा गयादीन दुबे के पास कोरांई गांव पहुंचे। बाबा से उन्होंने मदद मांगी तो बाबा ने सहयोग का आश्वासन दिया और अपने सिपाहियों की टोली की सुरक्षा में उन्हे जिला मुख्यालय भेजा। दस जून को बाबा गयादीन दुबे अपने सिपाहियों संग फतेहपुर मुख्यालय पहुंचे तो क्रांतिकारियों से सामना हुआ। इसके बाद वह अपने अंग्रेज अफसर दोस्त की मदद करने के बजाए क्रांतिकारियों के साथ हो गए। जिला जज टक्कर ने छत पर खड़े होकर जब बाबा को क्रांतिकारियों के साथ सुजान सिंह से बात करते देखा तो उसने खुदकुशी कर ली। मरने से पहले यूनियन जैक फहराने वाले गुंबज के ऊपर लिख दिया था कि बाबा गयादीन दुबे कोरांई ने विश्वासघात किया है। इसके आधार पर बाबा गयादीन दुबे को गिरफ्तार किया गया था। कुछ संस्मरणों में कहा गया है कि टक्कर क्रांतिकारियों की गोली का शिकार हुए थे। मरने से पहले उन्हें क्रांतिकारियों के साथ देखकर छत की गुम्बद पर यह लिखा गया था जो बाबा की गिरफ्तारी का कारण बना। बाद में अंग्रेजों ने बाबा गयादीन के अलावा उनके पिता पंडित सीताराम दुबे को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। जेल में अपमान न हो इसके लिए बाबा ने अपनी अंगूठी में लगे हीरे की कनी चाटकर खुदकुशी कर ली थी।
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